भारत की न्यूक्लियर छलांग: ईंधन बनाने वाला रिएक्टर सक्रिय

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कलपक्कम –  तमिलनाडु के तट पर इस हफ्ते एक बड़ी वैज्ञानिक उपलब्धि दर्ज हुई।  प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) ने 6 अप्रैल को क्रिटिकलिटी हासिल की। इसके साथ ही भारत ने अपने परमाणु कार्यक्रम में बड़ा कदम आगे बढ़ाया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसे ऊर्जा सुरक्षा की दिशा में निर्णायक बताते हैं।

रिएक्टर के अंदर वैज्ञानिक लगातार डेटा मॉनिटर करते हैं। इंदिरा गांधी परमाणु अनुसंधान केंद्र की टीम तापमान, न्यूट्रॉन फ्लो और सुरक्षा सिस्टम पर नजर रखती है। वहीं, बाहर स्थानीय लोग इस उपलब्धि को अपने विकास से जोड़ते हैं। छोटे कारोबारियों और कामगारों को इस परियोजना से रोजगार मिलता है।

यह रिएक्टर 500 मेगावॉट बिजली पैदा करने की क्षमता रखता है। इससे लाखों घरों को बिजली मिल सकती है। लेकिन इसकी असली ताकत इसकी तकनीक में छिपी है। यह पानी नहीं, बल्कि तरल सोडियम से ठंडा होता है। इससे तेज न्यूट्रॉन की गति बनी रहती है।

रिएक्टर में मिक्स्ड ऑक्साइड फ्यूल यानी यूरेनियम और प्लूटोनियम का मिश्रण इस्तेमाल होता है। इसके चारों ओर यूरेनियम-238 की परत रहती है। जब न्यूट्रॉन इस परत से टकराते हैं, तो नया प्लूटोनियम बनता है। यानी यह रिएक्टर जितना ईंधन जलाता है, उससे ज्यादा तैयार करता है।

क्रिटिकलिटी वह अवस्था है, जहां रिएक्शन खुद चलता रहता है। हर विखंडन अगला विखंडन शुरू करता है। यह संतुलन में रहता है, न तेज बढ़ता है न रुकता है। इसी से रिएक्टर की स्थिरता साबित होती है।

हालांकि, अभी बिजली उत्पादन शुरू नहीं होता। पहले वैज्ञानिक कम क्षमता पर परीक्षण करते हैं। फिर वे सिस्टम की सुरक्षा और व्यवहार को समझते हैं। इसके बाद ही रिएक्टर ग्रिड से जुड़ता है।

भारत ने यह राह दशकों पहले तय की थी। वैज्ञानिक होमी भाभा ने तीन-चरणीय परमाणु योजना बनाई थी। पहले चरण में यूरेनियम से बिजली बनी। दूसरे चरण में प्लूटोनियम का उपयोग होता है, जिसमें यह रिएक्टर आता है। तीसरे चरण में थोरियम का इस्तेमाल होगा।

भारत के पास यूरेनियम कम है, लेकिन थोरियम का भंडार बड़ा है। यह संसाधन देश को लंबे समय तक ऊर्जा दे सकता है। हालांकि, थोरियम सीधे इस्तेमाल नहीं होता। इसे पहले उपयोगी ईंधन में बदलना पड़ता है। यह काम तेज न्यूट्रॉन वाले रिएक्टर ही करते हैं।

अब वैज्ञानिक परीक्षण जारी रखते हैं। इसके बाद रिएक्टर बिजली उत्पादन शुरू करेगा। सरकार भविष्य में और ऐसे रिएक्टर बनाने की योजना बनाती है।

यह उपलब्धि सिर्फ तकनीक नहीं दिखाती। यह 70 साल पुरानी सोच को आगे बढ़ाती है। भारत अब ऊर्जा आत्मनिर्भरता की ओर एक और मजबूत कदम बढ़ाता है।


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