नई दिल्ली – भारत का सर्वोच्च न्यायालय आज एक अहम मोड़ पर पहुंचता है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई में नौ जजों की बेंच सबरीमाला मामले की अंतिम सुनवाई शुरू करती है। अदालत अब तय करती है कि क्या समानता और संवैधानिक नैतिकता धार्मिक परंपराओं पर भारी पड़ सकती हैं।
सुनवाई की शुरुआत से ही रुख साफ दिखता है। जज सात बड़े सवाल उठाते हैं। वे आस्था, समानता और “आवश्यक धार्मिक प्रथा” की सीमा तय करना चाहते हैं। साथ ही, वे यह भी जांचते हैं कि अदालत को धार्मिक मामलों में कितना दखल देना चाहिए।
केरल के सबरीमाला मंदिर के आसपास हलचल बढ़ती है। तीर्थयात्री और स्थानीय लोग फैसले पर नजर रखते हैं। पंबा और नीलक्कल के बाजारों में चर्चा तेज होती है। दुकानदार कहते हैं कि हर फैसले का असर सीधे कारोबार पर पड़ता है। लोग 2018 के विरोध और तनाव को याद करते हैं, इसलिए इस बार भी अनिश्चितता बनी रहती है।
सबरीमाला मंदिर भगवान अयप्पा को समर्पित है। भक्त उन्हें नैष्ठिक ब्रह्मचारी मानते हैं। इसलिए 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर रोक की परंपरा विकसित होती है। श्रद्धालु 41 दिन का व्रत रखते हैं और फिर कठिन यात्रा करते हैं। यह परंपरा अनुशासन और भक्ति का प्रतीक बनती है।
इतिहास भी इस प्रथा की ओर इशारा करता है। 19वीं सदी के रिकॉर्ड में भी ऐसी सीमाओं का जिक्र मिलता है। हालांकि, कई इतिहासकार बताते हैं कि पहले नियमों का पालन हमेशा एक जैसा नहीं रहा।
2006 में त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड (TDB) ने एक ज्योतिष अनुष्ठान कराया। इसके बाद महिला प्रवेश का मुद्दा फिर उभरता है। इसी बीच, इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन (Indian Young Lawyers Association – IYLA) सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करता है और इसे समानता का मुद्दा बनाता है।
2018 में अदालत महिलाओं के प्रवेश की अनुमति देती है। इसके बाद राज्यभर में विरोध शुरू होता है। 2019 में दो महिलाओं के प्रवेश के बाद तनाव और बढ़ता है। फिर कई पक्ष पुनर्विचार याचिकाएं दाखिल करते हैं।
अब अदालत सिर्फ सबरीमाला तक सीमित नहीं रहती। वह दूसरे धर्मों से जुड़े मामलों को भी जोड़ती है। अदालत यह तय करना चाहती है कि संविधान और आस्था के बीच संतुलन कैसे बने।
केंद्र सरकार भी अपना पक्ष रखती है। वह पुनर्विचार का समर्थन करती है। वहीं, मंदिर बोर्ड परंपराओं को बनाए रखने की बात करता है।
अदालत इस महीने के अंत तक सुनवाई पूरी करने का लक्ष्य रखती है। फैसला देश की न्याय व्यवस्था पर गहरा असर डालेगा। यह तय करेगा कि लोकतंत्र में अंतिम शब्द किसका होगा—आस्था का या अधिकार का।