बंगाल चुनाव बनाम समय: वोटर लिस्ट विवाद ने बढ़ाई चुनौती

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पश्चिम बंगाल में चुनाव नजदीक आते ही अनिश्चितता बढ़ती दिखती है। 23 अप्रैल की तारीख करीब आती है। इसी बीच, सबकी नजर सर्वोच्च न्यायालय पर टिक जाती है। कोर्ट आज स्पेशल इंटेंसिव रिविजन यानी SIR प्रक्रिया पर सुनवाई करता है। साथ ही, न्यायिक अधिकारी संशोधित वोटर लिस्ट जमा करने की समयसीमा पूरी करने में जुटे हैं। यह टकराव नई चिंता पैदा करता है।

सबसे पहले, चुनाव का पैमाना बड़ा है। राज्य की 294 सीटों पर दो चरणों में मतदान होना है। 23 और 29 अप्रैल को वोटिंग तय है। लेकिन, इसके पीछे एक जटिल प्रक्रिया चलती है। 20 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट ने दखल दिया। उसने अनुच्छेद 142 के तहत हस्तक्षेप किया। कोर्ट ने राज्य सरकार और भारत निर्वाचन आयोग के बीच भरोसे की कमी को दूर करने की कोशिश की।

इसके बाद, आंकड़े तस्वीर साफ करते हैं। SIR प्रक्रिया में करीब 60 लाख नाम हटे। अब समीक्षा के दौरान लगभग 33 लाख नाम वापस आने की संभावना दिखती है। फिर भी, करीब 27 लाख नाम बाहर रह जाते हैं। यह स्थिति बड़े स्तर पर मताधिकार छिनने का संकेत देती है।

इसी कारण, कोर्ट ने कलकत्ता उच्च न्यायालय को निर्देश दिया। उसने 530 न्यायिक अधिकारियों की टीम बनाई। बाद में यह संख्या 700 तक पहुंची। पड़ोसी राज्यों से भी अधिकारी बुलाए गए। इन अधिकारियों ने इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर की भूमिका संभाली। उन्होंने लंबित दावों और आपत्तियों की जांच शुरू की।

हालांकि, यहीं नई समस्या सामने आती है। अगला चरण अपीलीय ट्रिब्यूनल का है। लेकिन, इन ट्रिब्यूनलों की कार्यप्रणाली अभी साफ नहीं होती। समय तेजी से निकलता है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या सभी आपत्तियों का समाधान मतदान से पहले हो पाएगा।

जमीनी हालात भी तनाव दिखाते हैं। मतदाता अपने नाम को लेकर असमंजस में हैं। राजनीतिक कार्यकर्ता सूची की जांच में जुटे हैं। मालदा में हालात और बिगड़े। वहां भीड़ ने न्यायिक अधिकारियों को घंटों तक रोके रखा। यह घटना प्रशासनिक दबाव को और बढ़ाती है।

इसी बीच, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने केंद्र पर निशाना साधा। उन्होंने चुनाव में देरी की साजिश का आरोप लगाया। साथ ही, राष्ट्रपति शासन की आशंका भी जताई। दूसरी ओर, विपक्ष इन आरोपों को खारिज करता है।

अब कानूनी स्थिति और उलझती है। नामांकन की अंतिम तारीख के बाद वोटर लिस्ट फ्रीज हो जाती है। पहले चरण के लिए यह समयसीमा तुरंत सामने है। इसके बाद कोई नाम जोड़ा या हटाया नहीं जा सकता। ऐसे में, ट्रिब्यूनल की प्रक्रिया अधूरी रह सकती है।

विशेषज्ञ इस स्थिति पर सुझाव देते हैं। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त शहाबुद्दीन याकूब कुरैशी समाधान बताते हैं। वे कहते हैं कि पुरानी वैध वोटर लिस्ट लागू रह सकती है। साथ ही, वे यह भी सुझाव देते हैं कि लंबित आवेदनों वाले मतदाताओं को वोट देने की अनुमति मिल सकती है।

उधर, सुप्रीम कोर्ट ने भी प्रक्रिया में बदलाव किया। उसने ट्रिब्यूनल को नए दस्तावेज स्वीकार करने की छूट दी। साथ ही, उन्हें अपनी प्रक्रिया तय करने का अधिकार दिया। इससे निष्पक्षता सुनिश्चित करने की कोशिश होती है।

फिर भी, समय सबसे बड़ी चुनौती बनता है। सभी अपीलों का निपटारा मतदान से पहले करना मुश्किल दिखता है। ऐसे में, दो रास्ते सामने आते हैं। पहला, पुरानी वोटर लिस्ट के साथ चुनाव कराना। दूसरा, सभी को वोट देने देना और बाद में फैसला करना।

अंत में, फैसला सुप्रीम कोर्ट के हाथ में रहता है। मुख्य न्यायाधीश की अगुवाई वाली बेंच आगे का रास्ता तय करेगी। फिलहाल, बंगाल समय के खिलाफ दौड़ता दिखता है, जहां लोकतंत्र और प्रक्रिया दोनों की परीक्षा होती है।


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