दिल्ली में राजनीतिक और कानूनी हलचल तेज हो गई। अरविंद केजरीवाल आज खुद दिल्ली उच्च न्यायालय में पेश होते हैं। वे आबकारी नीति मामले में अपनी दलील सीधे रखते हैं। इसके साथ ही, आम आदमी पार्टी ने आक्रामक कानूनी रणनीति अपनाई।
सबसे पहले, 2 अप्रैल को अदालत ने सख्त रुख दिखाया। कोर्ट ने केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और अन्य आरोपियों को आखिरी मौका दिया। सभी को प्रवर्तन निदेशालय की याचिका पर जवाब दाखिल करना है। एजेंसी ट्रायल कोर्ट की कुछ टिप्पणियां हटाने की मांग करती है। वह इन टिप्पणियों को गैर-जरूरी बताती है।
इसके बाद, ईडी ने अपनी दलील स्पष्ट की। उसने कहा कि ट्रायल कोर्ट की टिप्पणियां केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) के केस से मेल नहीं खातीं। साथ ही, एजेंसी ने यह भी कहा कि उसे पहले अपनी बात रखने का मौका नहीं मिला। इसलिए, अब वह हाईकोर्ट से हस्तक्षेप चाहती है।
इसी बीच, केजरीवाल और उनके साथियों ने भी नया कदम उठाया। उन्होंने अदालत में निष्पक्षता पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि उन्हें सुनवाई में पक्षपात का डर है। इसके चलते, उन्होंने जस्टिस स्वर्णा कांता शर्मा से केस अलग करने की मांग की। यह मांग मामले को और जटिल बनाती है।
पृष्ठभूमि पर नजर डालें, तो 22 जनवरी को अहम फैसला आया था। राउज़ एवेन्यू कोर्ट ने केजरीवाल को समन मामले में राहत दी। कोर्ट ने कहा कि ईडी जानबूझकर गैर-हाजिरी साबित नहीं कर सकी। इस फैसले से केजरीवाल को बड़ी राहत मिली।
हालांकि, विवाद यहीं नहीं रुका। 30 मार्च को ईडी ने इस फैसले को चुनौती दी। उसने हाईकोर्ट का रुख किया और निचली अदालत के आदेश पर सवाल उठाए। इसके बाद, दोनों पक्षों ने अपनी तैयारी तेज कर दी। आज की सुनवाई उसी कड़ी का अहम हिस्सा बनती है।
जमीनी स्तर पर भी असर दिखता है। कोर्ट परिसर के बाहर समर्थकों की भीड़ जुटती है। आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता अपने नेता के समर्थन में नारे लगाते हैं। वहीं, विरोधी दल इस मुद्दे को लेकर सरकार पर निशाना साधते हैं। प्रशासन सुरक्षा व्यवस्था कड़ी रखता है।
साथ ही, कानूनी विशेषज्ञ इस मामले पर नजर बनाए रखते हैं। वे इसे प्रक्रिया और पारदर्शिता की परीक्षा मानते हैं। इसके अलावा, यह केस दिल्ली की राजनीति पर भी असर डालता है। आबकारी नीति पहले ही बड़ा मुद्दा बन चुकी है। अब कोर्ट की कार्रवाई इसे और चर्चा में लाती है।
आज केजरीवाल खुद अदालत में खड़े होते हैं। वे अपनी बात सीधे रखते हैं। यह कदम उनकी रणनीति में बदलाव दिखाता है। इससे साफ संकेत जाता है कि वे कानूनी लड़ाई को व्यक्तिगत स्तर पर भी लड़ना चाहते हैं।
आगे क्या होगा, यह अदालत तय करेगी। कोर्ट ईडी की मांग पर फैसला देगा। साथ ही, जज बदलने की याचिका पर भी सुनवाई होगी। ये दोनों फैसले केस की दिशा तय करेंगे।
फिलहाल, सभी की नजर हाईकोर्ट पर टिकी है। यह सुनवाई सिर्फ कानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक बड़े राजनीतिक संघर्ष का अहम पड़ाव बन गई है।