‘एयरपोर्ट समोसा’ से डेटा प्लान तक: राघव चड्ढा के ‘सॉफ्ट मुद्दों’ पर सियासी घमासान
नई दिल्ली – पहले, आम आदमी पार्टी (Aam Aadmi Party) के भीतर सुर बदले। फिर, रोजमर्रा के मुद्दों ने राघव चड्ढा को नए विवाद के केंद्र में ला दिया।
चड्ढा, जिन्हें कभी अरविंद केजरीवाल का करीबी माना जाता था, अब पार्टी के सवालों का सामना करते हैं। वह सीधा पूछते हैं—क्या मैंने कोई गलती की? वहीं, पार्टी के नेता कहते हैं कि वह आक्रामक राजनीति से बचते हैं।
हालांकि, चड्ढा अपनी लाइन पर टिके रहते हैं। वह कहते हैं कि संसद में आम लोगों की समस्याएं उठनी चाहिए।
जमीनी मुद्दों पर फोकस
एक तरफ, दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु जैसे शहर ट्रैफिक से जूझते हैं। लोग घंटों जाम में फंसते हैं। चड्ढा इसे आर्थिक नुकसान से जोड़ते हैं। वह बेहतर पब्लिक ट्रांसपोर्ट और प्लानिंग की मांग करते हैं।
दूसरी तरफ, वह टेलीकॉम कंपनियों पर सवाल उठाते हैं। वह 28 दिन के रिचार्ज को “मंथली” बताने पर आपत्ति जताते हैं। इससे यूजर्स साल में ज्यादा भुगतान करते हैं। साथ ही, वह डेटा खत्म होने की नीति पर भी सवाल उठाते हैं।
सामाजिक मुद्दों को भी आवाज
इसके बाद, चड्ढा पितृत्व अवकाश की मांग रखते हैं। वह कहते हैं कि बच्चों की जिम्मेदारी दोनों माता-पिता की होती है। वह इसे अधिकार के रूप में पेश करते हैं।
साथ ही, वह मेंस्ट्रुअल हेल्थ पर भी ध्यान दिलाते हैं। वह बताते हैं कि कई स्कूलों में बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं। इससे लड़कियां पढ़ाई छोड़ती हैं। वह इसे सम्मान और शिक्षा से जोड़ते हैं।
‘एयरपोर्ट समोसा’ से बहस तेज
फिर, एयरपोर्ट के महंगे खाने का मुद्दा चर्चा में आता है। चड्ढा सस्ते विकल्पों की जरूरत बताते हैं। वह उड़ान यात्री कैफे का समर्थन करते हैं, लेकिन इसकी सीमाओं की ओर भी इशारा करते हैं।
छत्रपति शिवाजी महाराज अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर वह यात्रियों से बात करते हैं। वह सस्ती चाय को उदाहरण बनाते हैं। यात्री इसे राहत के रूप में देखते हैं।
सुधार और श्रमिकों की बात
आगे, चड्ढा “राइट टू रिकॉल” की बात करते हैं। वह कहते हैं कि जनता को नेताओं को बीच में हटाने का अधिकार मिलना चाहिए।
वहीं, वह गिग वर्कर्स के मुद्दे भी उठाते हैं। वह डिलीवरी कर्मियों के साथ समय बिताते हैं। वह कम वेतन और ज्यादा दबाव की बात सामने लाते हैं।
पार्टी में टकराव जारी
इसी बीच, सौरभ भारद्वाज जैसे नेता उनकी आलोचना करते हैं। वह कहते हैं कि चड्ढा को केंद्र की सरकार, जिसका नेतृत्व नरेन्द्र मोदी करते हैं, पर ज्यादा हमला करना चाहिए।
लेकिन चड्ढा अपनी रणनीति नहीं बदलते। वह कहते हैं कि यही “सॉफ्ट” मुद्दे लोगों की असली जिंदगी तय करते हैं। अब सवाल यही है—क्या राजनीति रोजमर्रा के मुद्दों पर फोकस करेगी या टकराव पर?
