नई दिल्ली – देशभर में रसोई गैस की तस्वीर बदलती दिख रही है। कहीं सिलेंडर दो दिन में पहुंचता है, तो कहीं 40 दिन लगते हैं। इस अंतर ने लोगों की चिंता बढ़ा दी। पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने के बाद यह दबाव और साफ दिखने लगा।
सबसे पहले, 12 राज्यों से सामने आई जमीनी रिपोर्ट एक पैटर्न दिखाती है। लोग आसानी से LPG बुक करते हैं। लेकिन डिलीवरी में देरी बढ़ती जा रही है। कई शहरों में एक हफ्ते से ज्यादा इंतजार करना पड़ता है। कुछ इलाकों में यह समय कई हफ्तों तक खिंच जाता है। इसके चलते रोजमर्रा की रसोई प्रभावित हो रही है।
दिल्ली-एनसीआर में स्थिति ज्यादा गंभीर दिखती है। यहां बड़ी आबादी अभी भी LPG पर निर्भर है। खासकर निम्न और मध्यम वर्ग के लोग सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। पहले जहां 2-3 दिन में सिलेंडर मिल जाता था, अब 7-9 दिन लगते हैं। कई लोग एजेंसियों के चक्कर लगाते हैं, लेकिन उन्हें सिर्फ इंतजार का जवाब मिलता है।
ग्राउंड पर हालात और स्पष्ट दिखते हैं। करोल बाग के एक परिवार को बड़े भोज के लिए सिलेंडर जुटाने में मुश्किल आई। आखिरकार उन्होंने कोयले पर खाना बनवाने का फैसला लिया। वहीं, कई परिवार अब रोजमर्रा के भोजन के लिए भी संघर्ष कर रहे हैं। कुछ लोग महंगे दाम देकर ब्लैक मार्केट का सहारा लेते हैं।
उत्तर प्रदेश में तस्वीर मिली-जुली है। वाराणसी में लोगों को देरी का सामना करना पड़ रहा है। कई परिवार ब्लैक मार्केट से सिलेंडर खरीदते हैं। वहीं, बरेली के कुछ इलाकों में 4-5 दिन में डिलीवरी हो जाती है। लेकिन यहां भी कीमतें बढ़ने की शिकायत मिलती है। आगरा में हालात ज्यादा खराब हैं, जहां डिलीवरी 15-20 दिन तक पहुंच गई है।
दक्षिण भारत में भी फर्क दिखता है। कर्नाटक के बेंगलुरु में कई लोग 20-25 दिन तक इंतजार करते हैं। मंगलुरु में यह समय 30-40 दिन तक पहुंचता है। ऐसे में कई परिवार लकड़ी और चूल्हे पर लौट आए हैं। हालांकि, कुछ ग्रामीण इलाकों में स्थिति सामान्य बनी हुई है।
वहीं, तमिलनाडु में हालात कुछ हद तक संभले हैं। शुरुआती घबराहट के बाद अब सप्लाई स्थिर दिखती है। लोगों को समय पर सिलेंडर मिल रहा है। हालांकि, छोटे होटल और ढाबे अभी भी परेशानी झेल रहे हैं और वैकल्पिक ईंधन अपना रहे हैं।
पूर्वी भारत में भी देरी जारी है। कोलकाता और आसपास के इलाकों में बुकिंग आसान है, लेकिन डिलीवरी 7-10 दिन लेती है। ब्लैक मार्केट की शिकायतें भी सामने आती हैं। बिहार और झारखंड में गरीब परिवार सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। कई लोग फिर से लकड़ी और उपले पर खाना बनाते हैं।
इसके उलट, जहां पाइप्ड गैस की सुविधा है, वहां राहत दिखती है। अहमदाबाद और मुंबई जैसे शहरों में सप्लाई अपेक्षाकृत बेहतर है। हालांकि, कुछ जगहों पर लंबी कतारें अब भी दिखती हैं।
पृष्ठभूमि भी अहम है। भारत की LPG सप्लाई का बड़ा हिस्सा समुद्री रास्तों से आता है। खासकर होरमुज जलडमरूमध्य से। वहां किसी भी बाधा का असर सीधे घरेलू सप्लाई पर पड़ता है।
अंत में, देश में कोई एक जैसा संकट नहीं दिखता। लेकिन असमानता साफ नजर आती है। कहीं राहत है, तो कहीं लंबा इंतजार। खासकर गरीब परिवारों के लिए यह संकट ज्यादा गहरा है। उनके लिए गैस सिलेंडर अब जरूरत से ज्यादा चुनौती बनता जा रहा है।