पश्चिम एशिया संकट के बीच भारत का बड़ा कदम: खाड़ी से तेल घटा, रूस से आयात 82% उछला
khabarworld 27/03/2026 0
नई दिल्ली – पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष ने वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को झटका दिया। इसके साथ ही भारत ने तेजी से रणनीति बदली। उसने खाड़ी देशों से घटती आपूर्ति की भरपाई के लिए रूस से तेल खरीद बढ़ा दी। इस कदम ने फिलहाल सप्लाई संकट को काफी हद तक संभाल लिया।
ताजा आंकड़े स्पष्ट संकेत देते हैं। मार्च में भारत का रूसी तेल आयात तेजी से बढ़ा। यह लगभग 1.9 मिलियन बैरल प्रतिदिन तक पहुंच गया। अब यह स्तर ऐतिहासिक ऊंचाई के करीब दिखता है। विशेषज्ञों को उम्मीद है कि अप्रैल में भी यही रफ्तार बनी रहेगी।
इसके उलट, खाड़ी देशों से आयात तेजी से गिरा। इराक और यूएई से सप्लाई में भारी गिरावट दर्ज हुई। सऊदी अरब और कुवैत से भी आयात कम हुआ। इस गिरावट के पीछे एक बड़ा कारण सामने आया—होर्मुज जलडमरूमध्य में रुकावट।
यह समुद्री मार्ग वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का प्रमुख रास्ता है। भारत का बड़ा हिस्सा तेल इसी रास्ते से आता है। हाल के महीनों में लगभग आधा आयात इसी मार्ग से हुआ। इसलिए जैसे ही यहां आवाजाही प्रभावित हुई, सप्लाई पर सीधा असर पड़ा।
ग्राउंड एंगल: बाजार स्थिर, लेकिन दबाव जारी
जमीनी स्तर पर फिलहाल हालात नियंत्रण में दिखते हैं। पेट्रोल पंपों पर सप्लाई सामान्य बनी हुई है। ट्रांसपोर्ट सेक्टर भी बिना रुकावट के काम करता दिखता है। इससे आम लोगों को तत्काल परेशानी नहीं होती।
हालांकि, अंदरूनी दबाव साफ नजर आता है। रिफाइनरियां स्टॉक का उपयोग बढ़ाती हैं। वे वैकल्पिक सप्लाई स्रोत खोजती हैं। इससे सिस्टम चलता रहता है, लेकिन जोखिम खत्म नहीं होता।
छोटे कारोबारी और ट्रांसपोर्टर सतर्क रहते हैं। वे ईंधन कीमतों पर नजर रखते हैं। अगर संकट लंबा चलता है, तो लागत बढ़ सकती है। इससे आम लोगों पर भी असर पड़ सकता है।
पृष्ठभूमि: युद्ध ने बदल दिया ऊर्जा नक्शा
यह पूरा बदलाव 28 फरवरी के बाद शुरू हुआ। अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर सैन्य हमले किए। इसके जवाब में ईरान ने खाड़ी क्षेत्र में जवाबी कार्रवाई की। इससे पूरे क्षेत्र में तनाव बढ़ गया।
तनाव बढ़ते ही जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई। खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य पर खतरा बढ़ा। कई जहाजों ने इस रास्ते से बचना शुरू किया। बीमा कंपनियों ने भी जोखिम उठाने से इनकार किया।
इस स्थिति ने खाड़ी देशों से तेल की सप्लाई घटा दी। भारत, जो अपनी जरूरत का 88% तेल आयात करता है, तुरंत दबाव में आया। इसलिए उसे वैकल्पिक स्रोत तलाशने पड़े।
रूस बना सबसे बड़ा सहारा
भारत ने तेजी से रूस की ओर रुख किया। उसने रूसी तेल की खरीद बढ़ाई। मार्च में कुल आयात में रूस की हिस्सेदारी 45% से ज्यादा हो गई। फरवरी में यह करीब 20% थी।
रिफाइनरियों ने अप्रैल के लिए भी बड़े सौदे किए। उन्होंने करीब 60 मिलियन बैरल तेल पहले ही खरीद लिया। यह कदम दिखाता है कि भारत ने स्थिति को गंभीरता से लिया और समय पर निर्णय किया।
दिलचस्प बात यह है कि कुछ समय पहले भारत ने रूस से आयात घटाया था। उस समय अमेरिका के साथ व्यापार वार्ता चल रही थी। लेकिन अब हालात बदल गए। अमेरिका ने खुद नियमों में ढील दी।
डोनाल्ड ट्रम्प प्रशासन ने अस्थायी छूट दी। इससे भारत समेत कई देशों को रूसी तेल खरीदने की अनुमति मिली। इस फैसले का मकसद वैश्विक तेल कीमतों को काबू में रखना भी रहा।
अब रूसी तेल की मांग बढ़ गई है। पहले यह छूट पर मिलता था, लेकिन अब इसकी कीमतें भी मजबूत हुई हैं। फिर भी, उपलब्धता के कारण भारत इसे प्राथमिकता देता है।
सिस्टम मजबूत, लेकिन चुनौतियां बरकरार
भारत की रिफाइनिंग प्रणाली फिलहाल संतुलित बनी हुई है। कुल आयात थोड़ा कम हुआ है, लेकिन उत्पादन जारी है। रिफाइनरियां स्टॉक और वैकल्पिक स्रोतों से काम चला रही हैं।
विशेषज्ञ मानते हैं कि रूस अब भारत के लिए अहम सप्लायर बन चुका है। यह बदलाव अस्थायी भी हो सकता है और दीर्घकालिक भी। फिलहाल, यह रणनीति संकट से निपटने में मदद करती है।
आगे की दिशा: लचीलापन ही ताकत
आने वाले समय में सब कुछ पश्चिम एशिया की स्थिति पर निर्भर करेगा। अगर हालात सुधरते हैं, तो खाड़ी से सप्लाई फिर बढ़ सकती है। अगर तनाव जारी रहता है, तो भारत रूस पर और निर्भर हो सकता है।
फिलहाल, भारत ने तेजी से कदम उठाकर संकट को संभाला है। उसने सप्लाई बनाए रखी और बाजार को स्थिर रखा। यह दिखाता है कि बदलते हालात में लचीलापन सबसे बड़ी ताकत बनता है।
कुल मिलाकर, वैश्विक ऊर्जा परिदृश्य तेजी से बदलता दिखता है। भारत ने समय रहते दिशा बदली और अपने हितों की रक्षा की। आगे भी यही रणनीति उसे सुरक्षित रख सकती है।
