महिलाओं में ‘खामोश’ हार्ट अटैक का खतरा ज्यादा, अनुभवी सर्जन ने बताया कारण और चेतावनी

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नई दिल्ली – हार्ट अटैक को अक्सर तेज सीने के दर्द से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन महिलाओं में तस्वीर अलग दिखती है। उनके लक्षण धीमे और अस्पष्ट होते हैं। इसलिए लोग उन्हें पहचान नहीं पाते। इसी वजह से खतरा बढ़ जाता है।

जेरेमी लंदन, जो 25 साल से ज्यादा अनुभव रखते हैं, इस मुद्दे पर खुलकर बोले। उन्होंने बताया कि महिलाएं अक्सर पारंपरिक लक्षण नहीं दिखातीं। इसलिए डॉक्टर और मरीज दोनों शुरुआत में संकेतों को नजरअंदाज कर देते हैं।

उन्होंने साफ कहा कि यही सबसे बड़ी समस्या है। जब पहचान देर से होती है, तो इलाज भी देर से शुरू होता है। नतीजतन, जान का जोखिम बढ़ जाता है।

लक्षण अलग होते हैं, इसलिए पहचान मुश्किल होती है

आम तौर पर लोग हार्ट अटैक को अचानक होने वाले तेज दर्द से जोड़ते हैं। वे उम्मीद करते हैं कि दर्द हाथ या जबड़े तक जाएगा। लेकिन कई महिलाओं में ऐसा नहीं होता।

इसके बजाय, महिलाएं सांस फूलने की शिकायत करती हैं। वे लगातार थकान महसूस करती हैं। कई बार उन्हें मतली या उल्टी होती है। ये संकेत साधारण लगते हैं। इसलिए लोग इन्हें गंभीर नहीं मानते।

यहीं पर सबसे बड़ी चूक होती है। मरीज सोचती हैं कि यह गैस, कमजोरी या तनाव है। वे इलाज टाल देती हैं। इसी दौरान स्थिति बिगड़ती जाती है।

डॉ. लंदन ने बताया कि टीवी और फिल्मों में दिखाए जाने वाले लक्षण अक्सर पुरुषों जैसे होते हैं। महिलाएं उनसे खुद को जोड़ नहीं पातीं। इसलिए वे खतरे को पहचान नहीं पातीं।

ग्राउंड एंगल: रोजमर्रा की जिंदगी में छिप जाता है खतरा

जमीनी हकीकत अलग कहानी बताती है। कामकाजी महिलाएं थकान को नजरअंदाज करती हैं। वे इसे व्यस्त दिनचर्या का हिस्सा मानती हैं। गृहिणियां मतली को खानपान से जोड़ देती हैं।

कई महिलाएं डॉक्टर के पास जाने में देरी करती हैं। वे पहले घरेलू उपाय आजमाती हैं। परिवार भी अक्सर गंभीरता नहीं समझ पाता। क्योंकि सीने में तेज दर्द नहीं होता, इसलिए कोई अलार्म नहीं बजता।

अस्पतालों में डॉक्टर बताते हैं कि कई मरीज देर से पहुंचती हैं। तब तक हालत गंभीर हो जाती है। इमरजेंसी टीम को कम समय में ज्यादा काम करना पड़ता है।

इस देरी का असर सीधा परिणाम पर पड़ता है। जितनी देर होती है, उतना जोखिम बढ़ता है।

इलाज में देरी सबसे बड़ा खतरा बनती है

डॉक्टर बार-बार एक बात कहते हैं—समय सबसे अहम है। हार्ट अटैक में हर मिनट की कीमत होती है। जल्दी इलाज शुरू होता है, तो जान बचने की संभावना बढ़ती है।

लेकिन जब लक्षण साफ नहीं होते, तो जांच में समय लगता है। मरीज भी देर से पहुंचती हैं। इस वजह से इलाज की शुरुआत में देरी होती है।

डॉ. लंदन ने चेतावनी दी कि अगर शरीर में कुछ असामान्य लगे, तो तुरंत कदम उठाएं। इंतजार करना खतरनाक साबित हो सकता है। उन्होंने कहा कि हल्के लक्षण भी गंभीर हो सकते हैं।

पृष्ठभूमि: जैविक अंतर और जागरूकता की कमी

महिलाओं और पुरुषों के शरीर में फर्क होता है। हार्ट की बनावट और हार्मोनल पैटर्न अलग होते हैं। ये अंतर लक्षणों को प्रभावित करते हैं।

दूसरी ओर, जागरूकता की कमी भी बड़ी समस्या बनती है। लंबे समय तक प्रचार में सिर्फ पारंपरिक लक्षणों पर जोर रहा। इससे महिलाओं के अलग अनुभव नजरअंदाज हो गए।

अब डॉक्टर इस सोच को बदलने की कोशिश करते हैं। वे लोगों को बताते हैं कि हार्ट अटैक के संकेत अलग-अलग हो सकते हैं। वे नियमित जांच और जागरूकता पर जोर देते हैं।

आगे का रास्ता: पहचान बढ़ाएं, जोखिम घटाएं

विशेषज्ञ मानते हैं कि समाधान जागरूकता में छिपा है। महिलाएं अपने शरीर के संकेतों को समझें। परिवार समय पर प्रतिक्रिया दे। डॉक्टर भी हर लक्षण को गंभीरता से लें।

अगर सांस फूलती है, अचानक थकान होती है या मतली बार-बार आती है, तो इसे हल्के में न लें। तुरंत जांच कराएं। यही कदम जान बचा सकता है।

अंत में, संदेश साफ है। महिलाओं में हार्ट अटैक अक्सर ‘खामोश’ रहता है। इसलिए पहचान ही सबसे बड़ा हथियार बनती है। समय पर कार्रवाई जीवन बचा सकती है।


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