महिला आरक्षण पर बड़ा दांव: केंद्र ने जनगणना और परिसीमन से अलग करने की तैयारी तेज की

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sabha

नई दिल्ली – केंद्र सरकार ने महिला आरक्षण को लागू करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। अब सरकार इस प्रक्रिया को जनगणना और परिसीमन से अलग करने की योजना पर तेजी से काम कर रही है। इसके साथ ही, संसद में जल्द संशोधन विधेयक लाने की तैयारी भी शुरू हो गई है। सूत्रों के मुताबिक, सरकार इस प्रस्ताव को इसी सप्ताहांत तक पेश कर सकती है।

सबसे पहले, सरकार ने यह साफ संकेत दिया कि वह लंबे इंतजार को खत्म करना चाहती है। दरअसल, 2023 में महिला आरक्षण कानून पास हुआ, लेकिन उसमें एक शर्त जुड़ी रही। इस शर्त के तहत, आरक्षण लागू करने से पहले नई जनगणना और परिसीमन जरूरी था। अब सरकार इस शर्त को हटाने की दिशा में आगे बढ़ रही है। इसलिए, यह कदम सीधे तौर पर महिलाओं को जल्द राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।

इसके साथ ही, लोकसभा की सीटों में बड़े बदलाव की तैयारी भी दिख रही है। सूत्र बताते हैं कि कुल सीटों की संख्या 543 से बढ़कर 816 तक जा सकती है। इस नए ढांचे में 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। हालांकि, राज्यों का अनुपात पहले जैसा ही बना रहेगा। यानी, हर राज्य की हिस्सेदारी प्रतिशत के हिसाब से नहीं बदलेगी।

उदाहरण के तौर पर, उत्तर प्रदेश की तस्वीर देखें। अभी राज्य के पास 80 सीटें हैं। नए ढांचे में यह संख्या बढ़कर करीब 120 हो सकती है। वहीं, तमिलनाडु की सीटें 39 से बढ़कर लगभग 59 तक पहुंच सकती हैं। इस तरह, सीटें बढ़ेंगी, लेकिन राज्यों का अनुपात संतुलित रहेगा।

दूसरी ओर, सरकार परिसीमन प्रक्रिया को पूरी तरह खत्म नहीं कर रही। बल्कि, वह इसे अलग ट्रैक पर आगे बढ़ाना चाहती है। एक सहयोगी दल के नेता के अनुसार, सरकार जून तक परिसीमन आयोग बनाने की तैयारी कर रही है। यह आयोग नए सिरे से निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं तय करेगा। इसके बाद 2029 के लोकसभा चुनाव में महिला आरक्षण लागू करने का लक्ष्य रखा गया है।

यहां पर पृष्ठभूमि समझना जरूरी है। परिसीमन का मकसद जनसंख्या के आधार पर सीटों का बंटवारा तय करना होता है। पहले यह प्रक्रिया 2026 में होनी थी और 2021 की जनगणना के आधार पर आगे बढ़नी थी। लेकिन जनगणना नहीं हो सकी। इसके बाद यह माना गया कि अब 2027 की जनगणना के बाद ही परिसीमन होगा।

इसी मुद्दे पर दक्षिण भारत के राज्यों ने पहले ही चिंता जताई थी। उनका तर्क साफ रहा। उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में सफलता हासिल की। ऐसे में नई गणना के आधार पर सीटें घट सकती थीं। वहीं, ज्यादा आबादी वाले राज्यों को फायदा मिल सकता था। इसलिए, यह मुद्दा राजनीतिक रूप से संवेदनशील बन गया।

अब सरकार का नया प्रस्ताव इस विवाद को अलग तरीके से संभालने की कोशिश करता दिखता है। हालांकि, इससे एक नया सवाल भी उठता है। अगर राज्यों का अनुपात स्थिर रहता है, तो अलग-अलग राज्यों में वोट की कीमत में फर्क आ सकता है। उदाहरण के तौर पर, तमिलनाडु या केरल में एक वोट का वजन उत्तर प्रदेश के मुकाबले ज्यादा दिख सकता है।

इसी बीच, सरकार ने विपक्ष से बातचीत भी तेज कर दी है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह  ने विभिन्न दलों के नेताओं के साथ बैठक की। उन्होंने सहयोगी दलों और विपक्षी पार्टियों के साथ इस प्रस्ताव पर चर्चा की। इसके तहत कई क्षेत्रीय दलों को भी भरोसे में लेने की कोशिश हुई।

सूत्रों के मुताबिक, सरकार अब व्यापक सहमति बनाना चाहती है। इसलिए, वह सभी दलों के साथ खुलकर बातचीत कर रही है। संसद सत्र को सप्ताहांत तक बढ़ाने का फैसला भी इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।

वहीं, विपक्ष ने भी अपनी रणनीति तय करनी शुरू कर दी है। राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे की अध्यक्षता में बैठक हुई। इसमें सभी दलों ने प्रस्ताव का पूरा ब्योरा मांगा। विपक्ष का कहना है कि वह पहले संशोधन की पूरी जानकारी देखेगा, फिर अपना रुख तय करेगा।

इसके अलावा, आरक्षण के तरीके को लेकर भी चर्चा जारी है। सूत्र बताते हैं कि हर तीसरी सीट महिलाओं के लिए आरक्षित हो सकती है। इसके लिए लॉटरी सिस्टम पर भी विचार चल रहा है। हालांकि, यह साफ नहीं है कि सीटें स्थायी रूप से आरक्षित रहेंगी या फिर रोटेशन के आधार पर बदलेंगी।

साथ ही, अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए आरक्षित सीटों में से एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए तय की जाएंगी। लेकिन, जातिगत जनगणना के आंकड़ों का उपयोग नहीं किया जाएगा। सरकार का मानना है कि इससे प्रक्रिया जटिल हो सकती है।

अब सवाल उठता है कि सरकार इतनी जल्दबाजी क्यों दिखा रही है। इस पर एक अधिकारी ने साफ कहा कि जनगणना और परिसीमन की प्रक्रिया लंबी चल सकती है। अगर सरकार उनका इंतजार करती, तो महिला आरक्षण में और देरी होती। इसलिए, अब इसे अलग करके लागू करने की योजना बनाई गई है।

आगे की तस्वीर भी साफ दिखने लगी है। अगर यह संशोधन पास होता है, तो राज्यों की विधानसभाओं में भी बड़ा बदलाव आएगा। उदाहरण के तौर पर, उत्तर प्रदेश विधानसभा की सीटें 403 से बढ़कर 605 तक जा सकती हैं। वहीं, उत्तराखंड में यह संख्या 70 से बढ़कर 105 तक पहुंच सकती है। इन नई सीटों में एक-तिहाई महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी।

अंत में, यह साफ है कि केंद्र सरकार महिला आरक्षण को जल्द लागू करना चाहती है। वह कानूनी अड़चनों को हटाने के लिए रणनीति बदल रही है। हालांकि, राजनीतिक सहमति अभी बाकी है। अब सबकी नजर संसद पर टिकी है, जहां यह प्रस्ताव आने वाले दिनों में नई दिशा तय कर सकता है।


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