भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की अगुवाई वाली सरकार को लोकसभा में झटका लगा। फिर, सियासी हलचल तेज हुई। शुक्रवार को संविधान (131वां संशोधन) विधेयक जरूरी बहुमत नहीं जुटा पाया। विधेयक के पक्ष में 298 और विरोध में 230 वोट पड़े, जबकि पास होने के लिए 352 वोट चाहिए थे। इस तरह, विधेयक 54 वोट से पीछे रह गया। साथ ही, यह 2014 में नरेंद्र मोदी सरकार बनने के बाद पहली बड़ी संसदीय हार बनी।
इसके बाद, सरकार ने तुरंत रुख बदला। उसने डिलिमिटेशन बिल 2026 और यूनियन टेरिटरी कानून संशोधन बिल 2026 वापस ले लिए। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि तीनों विधेयक आपस में जुड़े थे, इसलिए आगे बढ़ना संभव नहीं रहा।
असल में, यह संशोधन 2023 के महिला आरक्षण कानून—नारी शक्ति वंदन अधिनियम—को जल्दी लागू करने के लिए लाया गया था। सरकार 33% आरक्षण को 2029 तक लागू करना चाहती थी। इसके लिए वह 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन करना चाहती थी। हालांकि, इसी बिंदु पर विवाद गहरा गया। विपक्ष ने पुराने आंकड़ों पर सीट बंटवारे को अनुचित बताया।
इसके साथ ही, सरकार ने सदन में आखिरी कोशिश भी की। गृह मंत्री अमित शाह ने राज्यों के बीच संतुलन बनाए रखने का भरोसा दिया। उन्होंने संशोधित प्रस्ताव लाने की पेशकश की। लेकिन विपक्ष नहीं माना। अखिलेश यादव ने साफ कहा कि उन्हें सरकार पर भरोसा नहीं है।
वहीं, विपक्ष ने अलग रणनीति अपनाई। राहुल गांधी ने कहा कि वह महिला आरक्षण का समर्थन करते हैं, लेकिन चुनावी नक्शा बदलने की कोशिश का विरोध करते हैं। इसी तरह, प्रियंका गांधी वाड्रा ने ओबीसी डेटा की कमी को बड़ा मुद्दा बताया। उन्होंने कहा कि पुराने जनगणना आंकड़ों से न्याय नहीं होगा।
जमीनी स्तर पर भी असर दिखा। दक्षिणी राज्यों में सीटों के बंटवारे को लेकर चिंता बढ़ी। क्षेत्रीय दलों ने अपने राजनीतिक वजन घटने का डर जताया। इसके अलावा, आने वाले राज्य चुनावों ने बहस को और तेज कर दिया।
पृष्ठभूमि में देखें तो देश नई जनगणना की तैयारी कर रहा है, जिसमें जातीय आंकड़े भी शामिल हो सकते हैं। ऐसे में परिसीमन का सवाल और संवेदनशील हो गया है।
अब आगे क्या? 2023 का कानून अभी भी लागू है, लेकिन उसे लागू करने के लिए परिसीमन जरूरी है। इसलिए, सरकार को नया रास्ता खोजना होगा। वह फिलहाल 543 सीटों में से एक-तिहाई सीट आरक्षित करने जैसे विकल्प पर विचार कर सकती है। शनिवार को होने वाली कैबिनेट बैठक इस दिशा में अगला कदम तय कर सकती है।
अंत में, यह हार बहस को खत्म नहीं करती। बल्कि, यह नए राजनीतिक समीकरण और रणनीति की शुरुआत करती है।