बिहार की राजनीति तेज मोड़ लेती है। नीतीश कुमार मुख्यमंत्री पद छोड़ते हैं और राज्यसभा की ओर बढ़ते हैं। इसके तुरंत बाद सम्राट चौधरी नए मुख्यमंत्री के तौर पर उभरते हैं। इस फैसले के साथ BJP राज्य में पहली बार अपना मुख्यमंत्री स्थापित करती है।
इसके बाद, चौधरी का राजनीतिक सफर चर्चा में आता है। वे शुरुआत लालु प्रसाद यादव की राष्ट्रीय जनता दल (राजद) (RJD) से करते हैं। फिर वे JDU में जाते हैं और अंत में भाजपा में शामिल होते हैं। शुरुआत में पार्टी से उनका जुड़ाव मजबूत नहीं दिखता, लेकिन वे तेजी से संगठन को समझते हैं। इसी वजह से 2023 में वे बिहार भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष बनते हैं।
उधर, उस समय राजनीतिक समीकरण अलग होते हैं। नीतीश कुमार महागठबंधन के साथ रहते हैं। भाजपा को राज्य में नई रणनीति की जरूरत पड़ती है। चौधरी इस चुनौती को स्वीकार करते हैं और संगठन को मजबूत करने में जुटते हैं। साथ ही, वे विधान परिषद में विपक्ष के नेता बनते हैं और नीतीश सरकार पर लगातार हमला बोलते हैं।
फिर, जनवरी 2024 में तस्वीर बदलती है। जेडीयू दोबारा NDA में लौटती है। चौधरी को उपमुख्यमंत्री बनाया जाता है और वित्त विभाग दिया जाता है। इसके बावजूद, वे संयम दिखाते हैं। वे नीतीश के साथ काम करते हैं, लेकिन कभी आगे निकलने की कोशिश नहीं करते। धीरे-धीरे वे भरोसा जीतते हैं।
इसी बीच, सामाजिक समीकरण अहम भूमिका निभाते हैं। नीतीश कुमार कुर्मी समुदाय से आते हैं, जबकि चौधरी कुशवाहा समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं। यह “लव-कुश” समीकरण गठबंधन को मजबूत करता है। यही संतुलन भाजपा के लिए भी फायदेमंद बनता है और चौधरी की स्वीकार्यता बढ़ती है।
इसके साथ, चौधरी धैर्य दिखाते हैं। 2024 से 2025 चुनाव तक वे बिना जल्दबाजी काम करते हैं। वे चुनाव प्रचार में नरेन्द्र मोदी और नीतीश दोनों को श्रेय देते हैं। NDA की जीत के बाद उनकी भूमिका और मजबूत होती है। खास बात यह रहती है कि नीतीश उन्हें गृह मंत्रालय जैसी अहम जिम्मेदारी सौंपते हैं।
उधर, मुख्यमंत्री पद के लिए कई नाम सामने आते हैं। विजय कुमार सिन्हा, नित्यानंद राय और संजय जायसवाल चर्चा में रहते हैं। फिर भी चौधरी सबसे आगे निकलते हैं। उनकी सियासी समझ और संतुलित छवि उन्हें बढ़त दिलाती है।
अंत में, भाजपा जोखिम का आकलन करती है। वह सामाजिक संतुलन और गठबंधन की मजबूती को प्राथमिकता देती है। इसी रणनीति के तहत पार्टी चौधरी के नाम पर मुहर लगाती है। इस तरह, सम्राट चौधरी अपने धैर्य, रणनीति और सही समय के साथ बिहार की सत्ता के शीर्ष तक पहुंचते हैं।