सोना-चांदी में तेज गिरावट, क्या निवेशकों के लिए यह खरीद का मौका है?

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बाजार सप्ताह की शुरुआत कमजोर संकेतों के साथ करता है। सोना और चांदी दोनों फिसलते हैं। वैश्विक तनाव बढ़ते हैं, खासकर संयुक्त राज्य अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत टूटने के बाद। इसके चलते निवेशक सतर्क रुख अपनाते हैं और नए सौदों से दूरी बनाते हैं।

इसके बाद, घरेलू बाजार भी दबाव में आता है। MCX पर सोना करीब ₹1,200 गिरकर ₹1,51,400 प्रति 10 ग्राम के आसपास ट्रेड करता है। वहीं, चांदी लगभग ₹6,000 टूटकर ₹2,37,000 प्रति किलो के पास पहुंचती है। यह गिरावट अचानक नहीं आती, बल्कि वैश्विक संकेतों से जुड़ी रहती है।

इसी बीच, कच्चे तेल की कीमतें तेजी पकड़ती हैं। तेल $104 प्रति बैरल के पार जाता है। इससे महंगाई की चिंता बढ़ती है। फिर, फेडरल रिजर्व के ब्याज दर घटाने की उम्मीद कमजोर पड़ती है। इसका सीधा असर सोना और चांदी पर दिखता है, क्योंकि ये ब्याज नहीं देते।

दूसरी तरफ, बाजार विशेषज्ञ सतर्क संकेत देते हैं। विश्लेषक बताते हैं कि सोना सीमित दायरे में घूमता है। खरीदार नीचे के स्तर पर ज्यादा सक्रिय नहीं दिखते। अगर सोना ₹1,54,000 के ऊपर जाता है, तो तेजी लौट सकती है। लेकिन ₹1,51,000 के नीचे फिसलने पर और गिरावट संभव दिखती है।

वहीं, चांदी पर दबाव और ज्यादा नजर आता है। औद्योगिक मांग कुछ सहारा देती है, लेकिन बिकवाली हावी रहती है। ₹2,40,000 के आसपास मजबूत रुकावट दिखती है। अगर कीमत ₹2,37,000 से नीचे जाती है, तो यह ₹2,35,000 तक खिसक सकती है। इससे बाजार की कमजोरी साफ दिखती है।

जमीनी स्तर पर, सर्राफा बाजार में मिश्रित रुझान दिखता है। कुछ खरीदार गिरावट का फायदा उठाने की कोशिश करते हैं। हालांकि, कई निवेशक अभी इंतजार करते हैं। वे साफ संकेत मिलने तक बड़े निवेश से बचते हैं।

इसी दौरान, रुपये पर भी दबाव बढ़ता है। कच्चे तेल की महंगाई भारतीय मुद्रा को कमजोर कर सकती है। साथ ही, विदेशी निवेश का रुख बदलता है, जिससे बाजार में उतार-चढ़ाव बढ़ता है।

पृष्ठभूमि में, वैश्विक हालात लगातार बदलते रहते हैं। भू-राजनीतिक तनाव, महंगाई और केंद्रीय बैंकों की नीतियां बाजार की दिशा तय करती हैं। सोना, जो आमतौर पर सुरक्षित निवेश माना जाता है, इस समय दबाव में रहता है।

यह गिरावट निवेशकों के लिए मिश्रित संकेत देती है। कुछ इसे खरीद का मौका मानते हैं, जबकि अन्य जोखिम देखते हैं। अब बाजार की दिशा इस बात पर निर्भर करती है कि वैश्विक तनाव, तेल की कीमतें और निवेशकों का भरोसा आगे कैसे बदलता है।


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