अमेरिका-ईरान परमाणु वार्ता अटकी, 20 साल बनाम 5 साल पर फंसा समझौता

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संयुक्त राज्य अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत तेज होती है। दोनों पक्ष सप्ताहांत में लंबी वार्ता करते हैं। अमेरिका 20 साल तक यूरेनियम संवर्धन रोकने की शर्त रखता है। वहीं, ईरान सिर्फ 5 साल का प्रस्ताव देता है। इसी अंतर से बातचीत अटक जाती है।

इसके बाद, अमेरिकी टीम सख्त रुख अपनाती है। वह लंबे समय तक रोक के साथ कई अतिरिक्त प्रतिबंध जोड़ती है। साथ ही, वह ईरान से उच्च संवर्धित यूरेनियम पूरी तरह हटाने की मांग करती है। दूसरी ओर, ईरान इस शर्त को ठुकराता है। वह निगरानी में यूरेनियम को कम संवर्धित करने का रास्ता सुझाता है। इस तरह, दोनों पक्ष अपने-अपने रुख पर टिके रहते हैं।

इसी बीच, इयान ब्रेमर एक नई संभावना बताते हैं। वे संकेत देते हैं कि दोनों पक्ष 12.5 साल के समझौते की ओर बढ़ सकते हैं। हालांकि, वे इसके स्रोत साझा नहीं करते। फिर भी, यह संकेत बातचीत में उम्मीद बनाए रखता है।

जमीनी स्तर पर, इस्लामाबाद में माहौल संवेदनशील रहता है। मध्यस्थ देश सक्रिय भूमिका निभाते हैं। शहबाज शरीफ बातचीत को आगे बढ़ाने की कोशिश करते हैं। साथ ही, बदर अब्देलअट्टी और हाकान फिदान भी दोनों पक्षों के बीच दूरी घटाने में जुटते हैं। वे शुरुआती कठोर रुख को नरम करने पर जोर देते हैं।

हालांकि, अचानक तनाव बढ़ता है। अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल इस्लामाबाद से जल्दी निकल जाता है। इससे ईरानी पक्ष चौंक जाता है। उन्हें लगता है कि समझौता करीब था। तभी जेडी वेंस सार्वजनिक बयान देते हैं और ईरान को जिम्मेदार ठहराते हैं। इस बयान से नाराजगी बढ़ती है और माहौल बिगड़ता है।

इसके साथ ही, डोनाल्ड ट्रंप अलग संकेत देते हैं। वे कहते हैं कि ईरान के “सही लोग” संपर्क में हैं और समझौता चाहते हैं। फिर भी, अमेरिका दबाव बनाए रखता है। वह ईरान से जुड़े शिपिंग नेटवर्क पर कार्रवाई की तैयारी करता है। यह रणनीति बातचीत और दबाव दोनों को साथ लेकर चलती है।

पृष्ठभूमि में, हालात पहले से तनावपूर्ण रहते हैं। एक अस्थायी युद्धविराम 21 अप्रैल तक ही टिकता है। इसलिए, यह वार्ता तनाव घटाने का बड़ा मौका बनती है। पिछले समझौतों में भी संवर्धन और निगरानी सबसे बड़े मुद्दे रहे हैं। इस बार भी वही टकराव सामने आता है।

अंत में, गतिरोध के बावजूद बातचीत पूरी तरह नहीं टूटती। अधिकारी आगे भी संपर्क बनाए रखते हैं। मध्यस्थ देश उम्मीद जताते हैं कि दोनों पक्ष बीच का रास्ता निकाल सकते हैं। अब नजर इस बात पर टिकती है कि क्या यह कूटनीति अगले दौर में ठोस समझौते में बदलती है।


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