मुंबई में कारोबारी हफ्ते की शुरुआत झटके के साथ होती है। बाजार खुलते ही बिकवाली हावी हो जाती है। BSE सेंसेक्स 1600 अंकों से ज्यादा गिरता है। साथ ही निफ्टी 50 करीब 2% नीचे आता है। निवेशक शुरुआती मिनटों में ही जोखिम कम करने लगते हैं।
सबसे पहले, कच्चे तेल की कीमतें बाजार को दबाव में लाती हैं। ब्रेंट क्रूड $100 के पार निकल जाता है और करीब $102 तक पहुंचता है। इसकी वजह साफ दिखती है। US और ईरान के बीच बातचीत आगे नहीं बढ़ती। इससे वैश्विक अनिश्चितता बढ़ती है और बाजार तुरंत प्रतिक्रिया देता है।
इसके बाद, भू-राजनीतिक तनाव और गहराता है। डोनाल्ड ट्रम्प स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ में नौसैनिक नाकाबंदी की बात करते हैं। यह इलाका दुनिया के बड़े तेल आपूर्ति मार्गों में आता है। ऐसे में सप्लाई बाधित होने की आशंका बनती है। यही डर निवेशकों को बेचने के लिए मजबूर करता है।
इसी दौरान, सेक्टर-वार गिरावट साफ दिखती है। बैंकिंग शेयरों पर ज्यादा दबाव आता है। निफ्टी बैंक 2% से अधिक गिरता है। मिडकैप शेयर भी पीछे नहीं रहते और तेज गिरावट दर्ज करते हैं। निवेशक सुरक्षित विकल्पों की तरफ रुख करते हैं।
हालांकि, पिछले हफ्ते तस्वीर अलग दिखी थी। दोनों प्रमुख सूचकांक करीब 6% चढ़े थे। निवेशकों ने उस समय अस्थायी संघर्ष विराम से राहत महसूस की थी। लेकिन अब ताजा घटनाक्रम उस भरोसे को तोड़ देता है। बाजार तेजी से अपना रुख बदलता है।
जमीनी स्तर पर, ब्रोकर बेचैनी महसूस करते हैं। ट्रेडिंग फ्लोर पर उतार-चढ़ाव बढ़ता है। रिटेल निवेशक भी सतर्क हो जाते हैं और नई खरीद से दूरी बनाते हैं। हर नजर अब वैश्विक संकेतों पर टिकती है।
दूसरी तरफ, विदेशी निवेशक लगातार पैसे निकालते हैं। अप्रैल में अब तक वे 5 अरब डॉलर से ज्यादा की बिकवाली कर चुके हैं। इससे पहले मार्च में भी रिकॉर्ड निकासी दिखी थी। यह ट्रेंड बाजार पर अतिरिक्त दबाव डालता है।
फिर भी, घरेलू निवेशक कुछ संतुलन बनाए रखते हैं। म्यूचुअल फंड में निवेश बढ़ता है और यह आठ महीने के उच्च स्तर पर पहुंचता है। यही प्रवाह गिरावट को कुछ हद तक थामता है। लेकिन बाहरी कारक फिलहाल ज्यादा असर डालते हैं।
पृष्ठभूमि में देखें तो ईरान से जुड़े तनाव शुरू होने के बाद से सेंसेक्स और निफ्टी करीब 4.5% गिर चुके हैं। महंगा तेल भारत के लिए चुनौती बढ़ाता है, क्योंकि देश आयात पर निर्भर रहता है। इससे महंगाई और नीतिगत फैसलों पर असर पड़ सकता है।
आगे की राह अब अनिश्चित दिखती है। विशेषज्ञ फिलहाल इंतजार की रणनीति अपनाने की सलाह देते हैं। बाजार की दिशा अब तेल की कीमतों और वैश्विक घटनाओं पर निर्भर करेगी।