पटना में सियासी हलचल तेज हो जाती है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार 14 अप्रैल को आखिरी कैबिनेट बैठक बुलाते हैं। इसके तुरंत बाद वे राज्यपाल से मिलकर इस्तीफा देने की तैयारी करते हैं। इसी बीच, प्रशासन प्रेस ब्रीफिंग की व्यवस्था करता है। साथ ही, 7 सर्कुलर रोड स्थित आवास पर हलचल बढ़ती है। ये सभी संकेत बदलाव को साफ दिखाते हैं।
अब नजर अगली चाल पर टिकती है। BJP गठबंधन में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरती है। 2025 चुनाव में उसे 89 सीटें मिलती हैं। वहीं JDU 85 सीटों के साथ दूसरे स्थान पर रहती है। एनडीए कुल 202 सीटें जीतकर मजबूत स्थिति बनाता है। इससे विपक्ष का प्रभाव घटता है।
हालांकि, भाजपा नेता अभी नाम पर चुप्पी रखते हैं। दिल्ली से जुड़े एक वरिष्ठ नेता साफ कहते हैं कि मुख्यमंत्री भाजपा से ही होगा। लेकिन वे नाम बताने से बचते हैं। वे फैसला शीर्ष नेतृत्व पर छोड़ते हैं। ऐसे में नरेन्द्र मोदी और अमित शाह अंतिम निर्णय लेंगे। इस रुख से सस्पेंस और बढ़ता है।
इसी दौरान, दावेदारों की चर्चा तेज होती है। डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी सबसे आगे दिखते हैं। वे कुशवाहा समाज से आते हैं और मजबूत ओबीसी समीकरण बनाते हैं। उनके पास प्रशासनिक अनुभव भी है। इसलिए उनका दावा मजबूत रहता है।
दूसरी तरफ, नित्यानंद राय भी दौड़ में बने रहते हैं। वे संगठन और चुनाव दोनों में पकड़ रखते हैं। साथ ही, दिलीप कुमार जायसवाल का नाम भी चर्चा में आता है। वे लंबे समय से पार्टी में सक्रिय भूमिका निभाते हैं।
फिर भी, भाजपा अक्सर चौंकाने वाले फैसले लेती है। इसलिए नए चेहरे की संभावना भी बनी रहती है। इसी बीच, जेडीयू के भीतर अलग रणनीति बनती है। पार्टी के कुछ नेता निशांत कुमार को डिप्टी सीएम के रूप में आगे बढ़ाना चाहते हैं। यह कदम परिवार की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने की कोशिश दिखाता है।
जमीन पर हलचल और बढ़ती है। दोनों दल अपने विधायकों को पटना बुलाते हैं। बंद कमरों में बैठकों का दौर शुरू होता है। भाजपा शिवराज सिंह चौहान को केंद्रीय पर्यवेक्षक बनाती है। इससे साफ होता है कि पार्टी इस फैसले को बेहद गंभीरता से लेती है।
अगले 48 घंटे बेहद अहम बनते हैं। भाजपा उसी दिन नेता का नाम तय कर सकती है, जिस दिन इस्तीफा होता है। इसके बाद एनडीए विधायक दल औपचारिक मंजूरी देगा। फिर गठबंधन सरकार बनाने का दावा पेश करेगा। अगर सब योजना के अनुसार चलता है, तो 15 अप्रैल को शपथ ग्रहण हो सकता है।
पृष्ठभूमि में एक बड़ा बदलाव दिखता है। लंबे समय तक नीतीश कुमार ने बिहार की राजनीति को दिशा दी। अब भाजपा सीधे नेतृत्व संभालने की तैयारी करती है। यही बदलाव राज्य की राजनीति का अगला अध्याय तय करेगा।