बस्तर की बदलती तस्वीर: शिक्षा, पर्यटन और विकास से नया अध्याय

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छत्तीसगढ़ अब बस्तर की दिशा बदलने में जुटा है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने मंगलवार को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मुलाकात की। उन्होंने एक विस्तृत विकास रोडमैप पेश किया। इस योजना में शिक्षा, स्वास्थ्य, सिंचाई और ईको-टूरिज्म को केंद्र में रखा गया।

सबसे पहले, सरकार ने उन इलाकों पर फोकस किया जो कभी माओवादी हिंसा के गढ़ रहे। बस्तर, सुकमा और दंतेवाड़ा जैसे जिले लंबे समय तक संघर्ष से जूझते रहे। लेकिन अब हालात बदलते दिखते हैं। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने हाल ही में दावा किया कि देश में वामपंथी उग्रवाद पर बड़ी प्रगति हुई है।

इसके बाद, सरकार ने विकास को अगला लक्ष्य बनाया। रोडमैप के तहत जगारगुंडा और गीदम में बड़े शिक्षा हब बनाने की योजना है। ये वही इलाके हैं जहां पहले बड़े हमले हुए। अब यहां पढ़ाई और कौशल विकास को बढ़ावा देने की तैयारी है। इससे युवाओं को नए मौके मिल सकते हैं।

साथ ही, गीदम में एक मेडिकल कॉलेज का प्रस्ताव भी रखा गया। वर्षों तक इन क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाएं कमजोर रहीं। माओवादी गतिविधियों ने निर्माण कार्यों को रोका। अब प्रशासन इन कमियों को दूर करना चाहता है। इससे स्थानीय लोगों को बेहतर इलाज मिलेगा।

इसी बीच, सिंचाई परियोजनाओं पर भी जोर दिया गया। इंद्रावती नदी पर दो बैराज बनाने की योजना है। यह नदी बस्तर के बीच से गुजरती है। पहले माओवादी इसे सुरक्षा बलों के खिलाफ प्राकृतिक ढाल की तरह इस्तेमाल करते थे। अब सरकार इसे खेती और जल प्रबंधन के लिए उपयोग करना चाहती है।

जमीन पर बदलाव साफ दिखने लगा है। पुवर्ती जैसे गांव, जहां कभी बाहरी लोगों का प्रवेश बंद था, अब खुलने लगे हैं। सुरक्षा बलों ने यहां कैंप स्थापित किए। इसके बाद प्रशासन ने विकास योजनाओं को आगे बढ़ाया।

दूसरी ओर, पर्यटन को नई पहचान देने की तैयारी है। जंगलों में कैनोपी वॉक और ग्लास ब्रिज जैसे प्रोजेक्ट प्रस्तावित हैं। सरकार का मानना है कि इससे रोजगार बढ़ेगा और बस्तर को नई पहचान मिलेगी। हालांकि, इसके लिए पहले इलाकों को सुरक्षित बनाना जरूरी है। इसलिए सुरक्षा बल डी-माइनिंग का काम कर रहे हैं।

पृष्ठभूमि देखें तो बस्तर कभी “रेड कॉरिडोर” का अहम हिस्सा रहा। हिंसा ने विकास को रोक दिया। अब सरकार उसी क्षेत्र को विकास के मॉडल में बदलना चाहती है।

अंत में, यह रोडमैप सिर्फ योजना नहीं, बल्कि बदलाव का संकेत देता है। अगर योजनाएं जमीन पर उतरीं, तो बस्तर संघर्ष की पहचान छोड़कर विकास की मिसाल बन सकता है।


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