₹50 हजार के विवाद से खुला किडनी रैकेट: कानपुर से कई राज्यों तक फैला नेटवर्क बेनकाब

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कानपुर: उत्तर प्रदेश के कानपुर में एक मामूली भुगतान विवाद ने बड़ा खुलासा कर दिया। ₹50,000 की शिकायत से शुरू हुई जांच ने करोड़ों के अवैध किडनी रैकेट का पर्दाफाश किया। पुलिस ने तुरंत कार्रवाई की। फिर जांच ने एक संगठित नेटवर्क की परतें खोलीं, जिसमें ब्रोकर, अस्पताल और संदिग्ध मेडिकल स्टाफ शामिल दिखे।

सबसे पहले एक डोनर पुलिस के पास पहुंचा। उसने कहा कि एजेंटों ने उसे ₹10 लाख का लालच दिया। लेकिन उसे पूरी रकम नहीं मिली। बार-बार देरी हुई। इसलिए उसने शिकायत दर्ज कराई। इसके बाद पुलिस ने जांच शुरू की और कई लोगों को हिरासत में लिया।

जांच के दौरान पुलिस ने शिवम अग्रवाल और सुरजीत सिंह आहूजा को मुख्य संदिग्ध के रूप में पकड़ा। दोनों से पूछताछ के बाद नेटवर्क का दायरा साफ होने लगा।

जांच में सामने आया कि आरोपी आर्थिक रूप से कमजोर युवाओं को निशाना बनाते थे। वे जल्दी पैसे का लालच देते थे। एक मामले में उत्तराखंड के युवक को रिश्तेदार की जरूरत बताकर राजी किया गया।

इसके बाद रावतपुर के एक निजी अस्पताल में ऑपरेशन हुआ। वहीं किडनी निकाली गई। फिर उसी किडनी को मुजफ्फरनगर की एक महिला के परिवार को ₹90 लाख से ज्यादा में बेचा गया। हालांकि डोनर को सिर्फ ₹6 लाख नकद और ₹3.5 लाख चेक में मिले।

जांच ने एक खास पैटर्न उजागर किया। नेटवर्क ने तीन अस्पतालों का इस्तेमाल किया। पहले अस्पताल में सर्जरी हुई। फिर दूसरे में डोनर को रखा गया। तीसरे में मरीज का इलाज हुआ। इस तरीके से किसी एक अस्पताल के पास पूरी जानकारी नहीं रही। इसलिए लंबे समय तक शक नहीं हुआ। सूत्रों के अनुसार, डोनर ‘आयुष’ को बाद में दूसरी जगह अलग पहचान के साथ भर्ती किया गया।

जांच में एक और चिंता सामने आई। आरोपी छात्रों और जरूरतमंद युवाओं को टारगेट करते थे। ‘आयुष’ ने खुद को MBA छात्र बताया। उसने शुरुआत में ₹4 लाख में सौदा किया।

एक अन्य मामले में एक छात्रा से भी किडनी दिलवाई गई। बाद में उसी अंग को कई गुना ज्यादा कीमत पर बेचा गया। इस तरह नेटवर्क ने मजबूरी का फायदा उठाया। पुलिस को अब एक बड़े गठजोड़ का शक है। ब्रोकर डोनर लाते थे। अस्पताल सुविधा देते थे। डॉक्टर सर्जरी करते थे। इस तरह पूरा सिस्टम एक साथ काम करता था।

हालांकि जांच अभी जारी है, लेकिन शुरुआती संकेत बताते हैं कि यह कोई छोटा मामला नहीं है।

पुलिस और स्वास्थ्य विभाग की टीमों ने कई अस्पतालों पर छापे मारे। रिकॉर्ड खंगाले गए। मरीजों और सर्जरी से जुड़े दस्तावेज जांच में लिए गए।

क्राइम ब्रांच ने देर रात कार्रवाई की। उसने एक डॉक्टर दंपति समेत कई लोगों को हिरासत में लिया। पुलिस ने उन अस्पतालों तक भी पहुंच बनाई, जहां मरीज को शिफ्ट किया गया था।

पूछताछ में डोनर ने अपनी पहचान बदली। पहले उसने मेरठ का बताया। फिर उसने बिहार के समस्तीपुर का जिक्र किया। इससे पुलिस को शक हुआ कि नेटवर्क कई राज्यों में फैला है।

अब जांच एजेंसियां अलग-अलग राज्यों से जुड़े कनेक्शन जोड़ रही हैं। वे डोनर और रिसीवर के बीच के लिंक तलाश रही हैं।

जमीनी स्तर पर यह मामला बड़ी समस्या दिखाता है। कई युवा आर्थिक दबाव में गलत फैसले लेते हैं। वहीं नियम मौजूद होने के बावजूद निगरानी में कमी दिखती है।

अब पुलिस जांच आगे बढ़ा रही है। अधिकारियों को और खुलासों की उम्मीद है। आने वाले दिनों में और गिरफ्तारियां हो सकती हैं।

यह मामला साफ करता है कि एक छोटी शिकायत भी बड़े अपराध का पर्दाफाश कर सकती है।


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