पटना – नीतीश कुमार ने सोमवार को बिहार विधान परिषद से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने यह कदम राज्यसभा चुनाव के बाद उठाया। संविधान एक समय में एक ही सदन की सदस्यता की अनुमति देता है। इसलिए उन्होंने तय समय सीमा के भीतर पद छोड़ा।
उन्होंने 16 मार्च को राज्यसभा के लिए जीत दर्ज की। इसके बाद उनके पास 14 दिन का समय था। 30 मार्च अंतिम दिन रहा। उन्होंने समय रहते औपचारिकता पूरी की। इस तरह उन्होंने अनुच्छेद 101 और 190 के प्रावधानों का पालन किया।
पटना में इस्तीफे के बाद हलचल बढ़ गई। पार्टी कार्यालयों के बाहर कार्यकर्ता जुटे। उन्होंने अगले नेतृत्व को लेकर चर्चा शुरू की। समर्थकों ने नीतीश कुमार के फैसले को रणनीतिक बताया। वहीं, विपक्ष ने सरकार की स्थिरता पर सवाल उठाए। शहर के राजनीतिक गलियारों में दिनभर अटकलें तेज रहीं।
विधानसभा और परिषद के आसपास सुरक्षा सामान्य रही, लेकिन राजनीतिक गतिविधि बढ़ी। नेताओं ने बंद कमरे में बैठकें कीं। उन्होंने आगे की रणनीति पर विचार किया। जमीनी स्तर पर कार्यकर्ता केंद्रीय नेतृत्व के संकेत का इंतजार करते दिखे।
1950 के समानांतर सदस्यता निषेध नियम स्पष्ट दिशा देते हैं। ये नियम संसद और राज्य विधानमंडल की दोहरी सदस्यता पर रोक लगाते हैं। हर निर्वाचित प्रतिनिधि को एक पद चुनना होता है। नीतीश कुमार ने इसी नियम के तहत परिषद की सीट छोड़ी।
इसी बीच नितिन नबीन भी बिहार विधानसभा से इस्तीफा देने की तैयारी में हैं। पार्टी सूत्रों के अनुसार, संजय सरावगी औपचारिक प्रक्रिया पूरी कर सकते हैं। नबीन ने पहले दिल्ली में एक अहम बैठक के कारण देरी की। हालांकि, अब वे भी प्रक्रिया पूरी करने वाले हैं।
बिहार की राजनीति में ऐसे बदलाव अक्सर नई दिशा तय करते हैं। नीतीश कुमार लंबे समय से राज्य की राजनीति के केंद्र में रहे हैं। उनके फैसले गठबंधन और सत्ता समीकरणों को प्रभावित करते हैं।
अब सबसे बड़ा सवाल अगले मुख्यमंत्री को लेकर है। पार्टी जल्द फैसला ले सकती है। बैठकों का दौर जारी रहेगा। तब तक सियासी हलचल बनी रहेगी। सभी की नजर आने वाले दिनों के फैसलों पर टिकी है।