पश्चिम एशिया में तनाव तेजी से बढ़ता दिख रहा है। अब US और ईरान समय के खिलाफ दौड़ लगा रहे हैं। दोनों पक्ष 45 दिन के युद्धविराम पर सहमति बनाने की कोशिश कर रहे हैं। साथ ही, क्षेत्रीय मध्यस्थ लगातार संपर्क बनाए रखते हैं। लेकिन, समझौते की उम्मीद कमजोर नजर आती है।
सबसे पहले, बैकचैनल बातचीत तेज हुई। सूत्र बताते हैं कि कई स्तरों पर संवाद चलता रहा। हालांकि, हर दौर के बाद दूरी साफ दिखती है। इसी वजह से, अगले 48 घंटे बेहद अहम माने जा रहे हैं। अधिकारी मानते हैं कि सीमित समझौता भी मुश्किल दिखता है। फिर भी, राजनयिक इसे आखिरी मौका मानते हैं।
इस बीच, डोनाल्ड ट्रम्प ने दबाव और बढ़ा दिया। उन्होंने तेहरान को नई समयसीमा दी। पहले यह समयसीमा सोमवार शाम तक थी। फिर उन्होंने इसे 20 घंटे बढ़ाया। अब नई डेडलाइन तय हो चुकी है। ट्रंप एक तरफ बातचीत जारी रहने की बात करते हैं। दूसरी तरफ, वे सख्त सैन्य कार्रवाई की चेतावनी भी देते हैं। इससे माहौल और तनावपूर्ण हो गया।
जमीनी स्तर पर असर साफ दिखता है। खाड़ी देशों में लोग हालात पर नजर रखते हैं। तेल बाजार हर अपडेट पर प्रतिक्रिया देता है। खासकर होरमुज जलडमरूमध्य पर सभी की नजर टिकी है। यह मार्ग वैश्विक तेल सप्लाई के लिए अहम माना जाता है। इसलिए, किसी भी रुकावट से बड़ा असर पड़ सकता है।
इसके बाद, मध्यस्थता की कोशिशें तेज हुईं। पाकिस्तान, इजिप्ट और टर्की सक्रिय भूमिका निभाते हैं। साथ ही, अमेरिकी दूत स्टीव विटकॉफ और ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची सीधे संदेशों का आदान-प्रदान करते हैं। वाशिंगटन कई प्रस्ताव सामने रखता है। लेकिन, तेहरान अब तक किसी पर सहमत नहीं होता।
प्रस्तावित योजना दो चरणों में बंटी है। पहले चरण में 45 दिन का युद्धविराम लागू करने की बात होती है। इस दौरान दोनों पक्ष स्थायी समाधान पर चर्चा करेंगे। जरूरत पड़ने पर इस अवधि को बढ़ाया जा सकता है। फिर दूसरे चरण में व्यापक समझौते की दिशा में कदम बढ़ेंगे। इसका मकसद पूरे संघर्ष को खत्म करना रहेगा।
हालांकि, कई बड़े मुद्दे अब भी अटके हुए हैं। सबसे बड़ा विवाद होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर है। अमेरिका इसे पूरी तरह खोलना चाहता है। वहीं, ईरान इसे अपने दबाव के साधन के रूप में देखता है। इसके अलावा, ईरान के उच्च समृद्ध यूरेनियम भंडार पर भी मतभेद बने रहते हैं। अमेरिका इसे हटाने या कम करने की मांग करता है। लेकिन, ईरान ठोस गारंटी के बिना ऐसा कदम नहीं उठाना चाहता।
ईरानी अधिकारी अपने पुराने अनुभवों का जिक्र करते हैं। वे गाजा और लेबनान जैसे हालात का हवाला देते हैं। उनका कहना है कि वहां युद्धविराम के बाद भी हमले रुके नहीं। इसलिए, वे अल्पकालिक समझौते पर भरोसा नहीं करते। यही वजह है कि बातचीत आगे नहीं बढ़ पाती।
अगर बातचीत विफल होती है, तो जोखिम बढ़ जाएगा। अधिकारी चेतावनी देते हैं कि किसी भी हमले के बाद जवाबी कार्रवाई तेज हो सकती है। खाड़ी देशों के तेल और पानी के ढांचे निशाने पर आ सकते हैं। इससे क्षेत्र में बड़ा संकट खड़ा हो सकता है।
फिलहाल, बातचीत जारी है। लेकिन, दोनों पक्ष अपनी-अपनी शर्तों पर अड़े रहते हैं। ऐसे में, आने वाले घंटे तय करेंगे कि क्षेत्र तनाव से बाहर निकलता है या बड़े टकराव की ओर बढ़ता है।