भारत के साथ व्यापार में ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति, चीन जैसी गलती नहीं दोहराएगा अमेरिका
khabarworld 06/03/2026 0
अमेरिका ने भारत के साथ बढ़ते आर्थिक और व्यापारिक संबंधों को लेकर स्पष्ट संकेत दिया है। वाशिंगटन सहयोग बढ़ाना चाहता है, लेकिन वह अपने राष्ट्रीय हितों को सबसे ऊपर रखेगा। अमेरिकी नेतृत्व मानता है कि उसने दो दशक पहले चीन के साथ व्यापार में कुछ रणनीतिक गलतियां की थीं। अब वह वही रास्ता दोहराना नहीं चाहता।
अमेरिकी उपविदेश मंत्री क्रिस्टोफर लैंडाउ ने गुरुवार को नई दिल्ली में आयोजित रायसीना डायलॉग में यह बात कही। उन्होंने कहा कि अमेरिका भारत के साथ व्यापारिक साझेदारी को आगे बढ़ाएगा, लेकिन इस बार वह अधिक सावधानी और स्पष्ट रणनीति के साथ आगे बढ़ेगा।
लैंडाउ ने कहा कि अमेरिका ने चीन के साथ अपने पुराने अनुभवों से सबक लिया है। उस दौर में अमेरिका ने चीन को कई बाजारों में तेजी से विस्तार करने का अवसर दिया। बाद में अमेरिकी उद्योगों को कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ा। इसलिए अब अमेरिका भारत के साथ व्यापार में अधिक संतुलित और सुरक्षित रणनीति अपनाएगा।
उन्होंने साफ कहा कि अमेरिका जो भी आर्थिक समझौते करेगा, उनमें अमेरिकी नागरिकों के हितों का ध्यान रखेगा। अमेरिकी सरकार को अपने लोगों के प्रति जवाबदेह रहना पड़ता है। इसी तरह भारत सरकार भी अपने नागरिकों के प्रति जवाबदेह रहती है।
हालांकि लैंडाउ ने यह भी स्पष्ट किया कि “अमेरिका फर्स्ट” का मतलब “अमेरिका अकेला” नहीं है। उन्होंने कहा कि अमेरिका अपने लक्ष्यों को दूसरे देशों के साथ सहयोग के जरिए भी हासिल करना चाहता है। उनके अनुसार हर संप्रभु देश अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देता है।
उन्होंने कहा कि जैसे अमेरिका अपने देश को मजबूत बनाना चाहता है, वैसे ही भारत के नेता भी अपने देश को आगे बढ़ाना चाहते हैं। इस दृष्टिकोण से दोनों देशों के बीच सहयोग स्वाभाविक और व्यावहारिक है।
लैंडाउ ने भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि 21वीं सदी की दिशा काफी हद तक भारत के उभार से तय होगी। दुनिया की सबसे बड़ी आबादी, बढ़ती अर्थव्यवस्था और विशाल संसाधन भारत को वैश्विक मंच पर महत्वपूर्ण बनाते हैं।
उन्होंने कहा कि अमेरिका और भारत के बीच साझेदारी किसी दान या परोपकार पर आधारित नहीं है। दोनों देश अपने-अपने हितों को ध्यान में रखकर सहयोग बढ़ा रहे हैं। इसलिए यह संबंध व्यावहारिक और दीर्घकालिक है।
लैंडाउ ने आगे कहा कि अमेरिका भारत के साथ सहयोग में कई “विन-विन” अवसर देखता है। दोनों देश व्यापार, ऊर्जा, प्रौद्योगिकी और रक्षा जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ा सकते हैं। इससे दोनों अर्थव्यवस्थाओं को फायदा होगा।
उन्होंने यह भी बताया कि भारत और अमेरिका के बीच चल रही व्यापार वार्ताएं अंतिम चरण में पहुंच चुकी हैं। दोनों पक्ष जल्द ही व्यापक द्विपक्षीय व्यापार समझौते की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं।
पिछले महीने दोनों देशों ने एक अंतरिम व्यापार समझौते के ढांचे को अंतिम रूप दिया। यह समझौता व्यापक भारत-अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार समझौते का हिस्सा है। इस समझौते का मुख्य उद्देश्य व्यापार को आसान बनाना और शुल्कों को कम करना है।
अमेरिका ने भारतीय वस्तुओं पर पारस्परिक शुल्क दर को 25 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत कर दिया है। साथ ही अमेरिका ने वह 25 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क भी हटा दिया, जो उसने भारत द्वारा रूसी तेल खरीदने के कारण लगाया था।
इसके बदले भारत ने अपनी ऊर्जा खरीद नीति में बड़ा बदलाव करने का फैसला किया। भारत अब रूसी कच्चे तेल के आयात को धीरे-धीरे कम करेगा। इसके साथ ही भारत अमेरिका से ऊर्जा, विमानन और उच्च प्रौद्योगिकी से जुड़े उत्पादों की बड़ी खरीद करेगा।
भारत ने अगले पांच वर्षों में लगभग 500 अरब डॉलर के अमेरिकी ऊर्जा उत्पाद, विमान और हाई-टेक उपकरण खरीदने का लक्ष्य रखा है। दोनों देश उम्मीद करते हैं कि इससे आर्थिक साझेदारी और रणनीतिक सहयोग नई ऊंचाई पर पहुंचेगा।
इस तरह अमेरिका और भारत अपने संबंधों को मजबूत करना चाहते हैं। हालांकि अमेरिका इस बार स्पष्ट कर रहा है कि सहयोग के साथ-साथ वह अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा को भी बराबर प्राथमिकता देगा।
