2004 के बाद पहली बार बिना पीएम जवाब के राष्ट्रपति के भाषण पर लोकसभा की मुहर
khabarworld 05/02/2026 0
नई दिल्ली में बजट सत्र के दौरान गुरुवार को एक असामान्य स्थिति सामने आई। लोकसभा ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव को प्रधानमंत्री के जवाब के बिना ही मंजूरी दे दी। खास बात यह रही कि ऐसा पहली बार 2004 के बाद हुआ।
आमतौर पर, राष्ट्रपति के भाषण पर चर्चा के बाद प्रधानमंत्री सदन को संबोधित करते हैं। फिर सदन धन्यवाद प्रस्ताव पारित करता है। लेकिन इस बार हालात अलग रहे।
सबसे पहले, 28 जनवरी को राष्ट्रपति मुर्मू ने संसद के संयुक्त सत्र को संबोधित किया। उन्होंने सरकार की प्राथमिकताएं रखीं। उन्होंने विकास, रोजगार, सुरक्षा और कल्याण योजनाओं पर जोर दिया। इसके बाद लोकसभा और राज्यसभा में चर्चा शुरू हुई।
फिर, बुधवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जवाब तय था।
सरकार ने पूरी तैयारी की। मंत्री समय पर पहुंचे। सत्तापक्ष ने रणनीति बनाई। वहीं, विपक्ष ने कई मुद्दे उठाए। उन्होंने महंगाई, बेरोजगारी और राजनीतिक विवादों पर बहस की मांग की।
इसके बाद, सदन में हंगामा शुरू हुआ।
विपक्षी सांसद वेल में पहुंच गए। उन्होंने नारे लगाए। उन्होंने सरकार के खिलाफ प्रदर्शन किया। उन्होंने प्रधानमंत्री को निशाना बनाया। नतीजतन, कार्यवाही बार-बार बाधित हुई। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने सदस्यों से शांति बनाए रखने की अपील की। लेकिन विरोध जारी रहा।
इसलिए, अध्यक्ष ने सदन स्थगित कर दिया।
व्यवस्था बहाल नहीं हो सकी। प्रधानमंत्री को बोलने का मौका नहीं मिला। बाद में, अध्यक्ष ओम बिरला ने राष्ट्रपति के लिए धन्यवाद प्रस्ताव पढ़ा। उन्होंने इसे ध्वनिमत से पारित कराया। शोर-शराबे के बीच ही सदन ने प्रस्ताव को मंजूरी दे दी।
इसके बाद, अध्यक्ष ने सदन को दोपहर दो बजे तक के लिए स्थगित कर दिया।
गुरुवार को भी हालात नहीं सुधरे।
सुबह 11 बजे सदन की कार्यवाही शुरू हुई। तभी INDIA गठबंधन के सांसदों ने नारेबाजी शुरू कर दी। उन्होंने केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री पर हमला बोला। उन्होंने राहुल गांधी को बोलने का मौका न मिलने का मुद्दा उठाया।
विपक्ष का आरोप रहा कि अध्यक्ष ने राहुल गांधी को सदन में बोलने नहीं दिया। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें जनरल एम. एम. नरवणे की 2020 चीन विवाद से जुड़ी अप्रकाशित किताब का हवाला देने से रोका गया। इसलिए, विरोध और तेज हो गया।
उधर, सरकार ने इन आरोपों को खारिज किया।
सत्तापक्ष ने कहा कि अध्यक्ष ने नियमों के अनुसार काम किया। उन्होंने विपक्ष पर जानबूझकर हंगामा करने का आरोप लगाया। उनका कहना रहा कि विपक्ष बजट सत्र को बाधित करना चाहता है। इससे पहले भी तनाव बढ़ चुका था।
मंगलवार को लोकसभा ने कांग्रेस के आठ सांसदों को निलंबित कर दिया। यह निलंबन पूरे सत्र के लिए रहा। इसके बाद विपक्ष ने विरोध तेज कर दिया। उन्होंने सदन की कार्यवाही रोक दी। उन्होंने निलंबन वापस लेने की मांग की। नतीजतन, टकराव और गहरा गया।
राजनीतिक जानकार इस घटनाक्रम को बढ़ते ध्रुवीकरण से जोड़ रहे हैं। उनका कहना है कि संसद में संवाद की जगह कम हो रही है। बार-बार के स्थगन से कानून बनाने की प्रक्रिया प्रभावित होती है। यह घटना उसी प्रवृत्ति को दर्शाती है। इस बीच, 2004 की घटना भी चर्चा में आई।
उस समय भाजपा ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को धन्यवाद प्रस्ताव पर जवाब नहीं देने दिया था। बाद में, 2005 में सिंह ने संसद में इसका जिक्र किया था। हाल ही में कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने उस भाषण का वीडियो सोशल मीडिया पर साझा किया। फिलहाल, औपचारिक प्रक्रिया पूरी हो चुकी है।
धन्यवाद प्रस्ताव पारित हो गया है। बजट सत्र आगे बढ़ रहा है। लेकिन प्रधानमंत्री के जवाब के बिना यह प्रक्रिया अधूरी मानी जा रही है। इससे सरकार का पक्ष पूरी तरह सामने नहीं आ सका। अंत में, यह घटना एक चेतावनी देती है। अगर टकराव और हंगामा ऐसे ही चलता रहा, तो संसद की परंपराएं कमजोर होंगी। संवाद और अनुशासन ही लोकतंत्र को मजबूत बना सकते हैं।
