टिड्डी दल के हमले से फसलों को बचा सकता है नीम

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एमएस स्वामीनाथन ने नीम के तेल को बताया गुणकारी



नई दिल्ली, 02 जून (हि.स.)। देश के कई राज्यों में टिड्डी दल के हमले से परेशान किसानों के लिए कृषि वैज्ञानिक एमएस स्वामीनाथन ने नीम का इस्तेमाल करने की सलाह दी है। हरित क्रांति के जनक स्वामीनाथन के कहा कि टिड्डी दल का हमले से फसलों को गंभीर नुकसान पहुंच सकता है। इससे बचने के लिए किसानों को नीम के बीज से तैयार तेल के कीटनाशक का छिड़काव फसलों पर करना चाहिए। उन्होंने ट्वीट करके जानकारी दी कि नीम कीटनाशक गुणों से भरपूर होने के साथ खाद का भी काम करता है। इसके इस्तेमाल से किसान फसलों के नुकसान को बचा लेंगे।
दिल्ली के यमुना बायोडायवर्सिटी पार्क के कीट वैज्ञानिक डॉ. मोहम्मद फैसल ने बताया कि फसलों पर नीम के तेल के छिड़काव से फसलों को बचाया जा सकता है क्योंकि टिड्डी को नीम पसंद नहीं है। टिड्डी नीम, आंक, शीशम, अंजीर, धतूरे को नहीं खाती। इन सब को छोड़कर सब पेड़ पौधों को टिड्डी खा जाती है। इससे खरीफ की फसलों को नुकसान पहुंच सकता है। इस बारे में संयुक्त राष्ट्र की संस्था खाद्य व कृषि संगठन (एफएओ) ने पिछले साल दिसंबर में टिड्डी दल के खतरे से आगाह किया था। दूसरी चेतावनी मई के महीने में भी जारी की गई है कि इस बार टिड्डी दल के हमले की समस्या गंभीर है। ज्यादा संख्या में होने के कारण इसका आंतक बिहार और  ओड़िशा तक जाने की संभावना जताई गई है।
एक झुंड में होते है 3-4 करोड़ टिड्डी
फसलों को भारी नुकसान पहुंचाने वाले टिड्डी दल का भयनाक रूप का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इसके एक ही झुंड में 3-4 करोड़ टिड्डी होते हैं। एक दल में कई झुंड होते हैं। इस बार राजस्थान के रेगिस्तान में अच्छी बारिश हुई थी जिसके कारण वहां टिड्डियों ने काफी अंडे दे रखे हैं। कीट वैज्ञानिक डॉ. फैसल बताते हैं कि एक टिड्डी अपने जीवन काल में 500 अंडे तक दे सकती हैं। एक बार में एक टिड्डी 100 अंडे देती है। यानि पांच बार अंडे देने की क्षमता है। अंडे देने के लिए टिड्डी तीन से चार इंच नीचे नम रेतीली भूमि में बैठती है। पाकिस्तान से आईं टिड्डियों ने पिछले साल सिंतबर में अंडे दिए थे, जो फरवरी में टिड्डी बने, अब इसकी दूसरी खेप जून-जुलाई को तैयार हो कर फसलों को नुकसान पहुंचाएगी।
साल 1926-31 में हुआ था टिड्डियों का खतरनाक हमला
इतिहास के मुताबिक टिड्डियों के दल के हमले की घटना का असर इससे पहले साल 1926 से लेकर 1931 तक रहा था। तब देश में अनाज की कमी हो गई थी। टिड्डी दल इतने शक्तिशाली थे कि वे असम तक पहुंच गए। वहां के चाय के बागानों को भी चट कर गए। यहां तक की रेलवे लाइन को भी प्रभावित किया था। क्योंकि टिड्डी रात को नहीं उड़ती, वे ठंडी जगह पर बैठ जाती है।
 कच्छ के रण में थे 4-6 हवाई जहाज तैनात
टिड्डी का खतरा राजस्थान के कच्छ के रण में हर साल होता है। नम भूमि में टिड्डी अंडे देती है। टिड्डी दल हर साल ईरान और पाकिस्तान से राजस्थान चले आते हैं लेकिन वे यहीं आसपास तक ही सिमटे रहते हैं। इससे निपटने के लिए पहले यही पर 4-6 हवाई जहाज तैनात होते थे। उन हवाई जहाज से टिड्डी के आंतक को रोका जाता था। पर अब हवाई जहाज का कोई अतापता नहीं है।

 


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