शुक्रवार सुबह संसद में फिर हंगामा हुआ। लोकसभा ने कार्यवाही शुरू की। लेकिन कुछ ही मिनटों में शोर मच गया। सांसदों ने नारे लगाए। विपक्षी नेताओं ने विरोध किया। इसलिए अध्यक्ष ने सदन स्थगित कर दिया।
इससे पहले, गुरुवार को भी संसद में तनाव दिखा। सत्तारूढ़ भाजपा और विपक्ष के बीच तीखी बहस हुई। लोकसभा में प्रदर्शन हुए। वहीं, राज्यसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कड़े बयान दिए। इसी कारण, शुक्रवार का माहौल पहले से ही गर्म रहा।
निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार, संसद सुबह 11 बजे बैठी। पहले प्रश्नकाल होना था। इसके बाद बजट 2026–27 पर सामान्य चर्चा शुरू होनी थी। सरकार इस बहस को अहम मान रही थी। हालांकि, हंगामे ने पूरी योजना बिगाड़ दी।
दरअसल, विवाद की जड़ राहुल गांधी का भाषण बना। गुरुवार को उन्होंने पूर्व सेना प्रमुख जनरल मनोज नरवणे की अप्रकाशित किताब का हवाला देना चाहा। उन्होंने चीन के साथ 2020 के तनाव का जिक्र किया। लेकिन अध्यक्ष ने इसकी अनुमति नहीं दी। भाजपा सांसदों ने इसका विरोध किया।
इसके बाद, विपक्ष भड़क उठा। कांग्रेस सांसदों ने शोर मचाया। उन्होंने सरकार पर बहस रोकने का आरोप लगाया। भाजपा नेताओं ने भी जवाब दिया। दोनों पक्ष आमने-सामने आ गए। अंत में, कांग्रेस सांसदों ने वॉकआउट किया। नतीजतन, सदन को स्थगित करना पड़ा।
इसी बीच, राज्यसभा में अलग माहौल दिखा। प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर बोलते हुए कांग्रेस पर हमला बोला। उन्होंने भाजपा सांसद रवनीत सिंह बिट्टू पर की गई “गद्दार” टिप्पणी का मुद्दा उठाया। उन्होंने इसे सिख समुदाय का अपमान बताया।
मोदी ने कहा कि कांग्रेस नेतृत्व घमंड में डूबा है। उन्होंने आरोप लगाया कि पार्टी ने जानबूझकर एक सिख सांसद को निशाना बनाया। उन्होंने इसे गुरुओं और सिख परंपराओं का अपमान बताया। इस बयान से राजनीतिक तनाव और बढ़ गया।
इस बीच, शुक्रवार का एजेंडा काफी लंबा था। लोकसभा को बजट 2026–27 पर चर्चा करनी थी। सरकार अपनी आर्थिक नीतियों का बचाव करना चाहती थी। वहीं, विपक्ष महंगाई, बेरोजगारी और कल्याण योजनाओं पर सवाल उठाना चाहता था।
दोपहर 3:30 बजे के बाद प्राइवेट मेंबर्स बिजनेस होना था। कई सांसद संविधान संशोधन विधेयक पेश करने वाले थे। चुनाव कानूनों में बदलाव से जुड़े प्रस्ताव भी सूची में थे। इन पर गंभीर बहस की उम्मीद थी।
इसके अलावा, सदन में कई सामाजिक और कल्याण विधेयक भी शामिल थे। इनमें किसानों, मछुआरों, छात्रों, बुजुर्गों, महिलाओं और मजदूरों से जुड़े मुद्दे थे। शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी चर्चा प्रस्तावित थी।
साथ ही, कई केंद्रीय मंत्री सदन में दस्तावेज रखने वाले थे। स्वास्थ्य, कानून, विदेश, रक्षा और शिपिंग मंत्रालय से जुड़े कागजात पेश होने थे। ये दस्तावेज सरकारी कामकाज की निगरानी के लिए जरूरी थे।
हालांकि, लगातार हंगामा इस काम में बाधा बन रहा है। हर स्थगन से बहस का समय घटता है। कानून बनाने की प्रक्रिया धीमी होती है। राजनीतिक टकराव और गहरा होता जाता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले दिनों में भी तनाव बना रह सकता है। सरकार अपना एजेंडा आगे बढ़ाना चाहती है। विपक्ष दबाव बनाना चाहता है। दोनों पक्ष पीछे हटने को तैयार नहीं दिखते।
अंत में, शुक्रवार की त्वरित स्थगन ने संसद की स्थिति पर सवाल खड़े कर दिए हैं। संवाद की जगह टकराव ले रहा है। अब देखना होगा कि आने वाले सत्रों में शांति लौटती है या हंगामा जारी रहता है।