पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी एक बड़ा कानूनी कदम उठाने जा रही हैं। वह सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष खुद रखने की तैयारी कर रही हैं। यदि कोर्ट अनुमति देता है, तो वह ऐसा करने वाली पहली मौजूदा मुख्यमंत्री बनेंगी।
बुधवार को कोर्ट उनकी याचिका पर सुनवाई करेगा। यह याचिका चुनाव आयोग की स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी एसआईआर प्रक्रिया के खिलाफ है। यह प्रक्रिया मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण से जुड़ी है।
इसी बीच, तृणमूल कांग्रेस के कई नेताओं ने भी इसी मुद्दे पर याचिकाएं दायर की हैं। सभी याचिकाएं एसआईआर को रद्द करने की मांग करती हैं। साथ ही, वे चाहते हैं कि 2026 के विधानसभा चुनाव 2025 की मतदाता सूची के आधार पर हों।
इस कदम से ममता बनर्जी और चुनाव आयोग के बीच टकराव तेज हो गया है।
ममता का कहना है कि यह प्रक्रिया लाखों मतदाताओं को बाहर कर सकती है। उनके अनुसार, अधिकारी सत्यापन के नाम पर वास्तविक मतदाताओं को परेशान कर रहे हैं। इसलिए, उन्होंने कोर्ट का रुख किया।
याचिका में उन्होंने 2025 में जारी सभी आदेशों को रद्द करने की मांग की है। उन्होंने कोर्ट से निर्देश देने की अपील की है कि चुनाव आयोग बिना बदलाव वाली सूची से ही चुनाव कराए।
इसके अलावा, उन्होंने 2002 की आधार सूची पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि पुरानी सूची पर आधारित जांच से मतदाताओं के अधिकार खतरे में पड़ते हैं।
याचिका में “लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी” का मुद्दा भी उठाया गया है। इसमें नाम की गलत वर्तनी, मामूली अंतर और दस्तावेजों की छोटी गलतियां शामिल हैं। ममता का कहना है कि इन्हीं कारणों से हजारों लोगों को नोटिस मिल रहे हैं।
इसलिए, उन्होंने ऐसी सुनवाइयों पर रोक लगाने की मांग की है। साथ ही, उन्होंने अधिकारियों से अपने स्तर पर सुधार करने को कहा है। उन्होंने सभी मामलों को वेबसाइट पर सार्वजनिक करने की भी अपील की है।
ममता ने पहले से जारी नोटिस वापस लेने की मांग की है। उन्होंने दस्तावेज जमा करने वाले मतदाताओं को हटाने पर रोक लगाने को कहा है। उन्होंने आधार को मान्य पहचान पत्र मानने की भी मांग की है।
इसके अलावा, उन्होंने फॉर्म-7 से जुड़े मामलों को ऑनलाइन डालने पर जोर दिया है। उन्होंने स्थानीय अधिकारियों को अधिक अधिकार देने की बात कही है। साथ ही, माइक्रो-ऑब्जर्वर की भूमिका सीमित करने की मांग की है।
यह याचिका सुप्रीम कोर्ट के हालिया हस्तक्षेप के बाद आई है। पिछले महीने कोर्ट ने मतदाताओं पर बढ़ते दबाव पर चिंता जताई थी। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुआई वाली पीठ ने चुनाव आयोग को कई निर्देश दिए थे।
कोर्ट ने कहा था कि एक करोड़ से अधिक लोगों को नोटिस मिले हैं। इससे आम लोगों पर मानसिक दबाव बढ़ा है। कोर्ट ने साफ कहा कि सुधार जरूरी है, लेकिन निष्पक्षता भी उतनी ही जरूरी है।
इसके बाद, कोर्ट ने पारदर्शिता बढ़ाने के निर्देश दिए। उसने पंचायत और ब्लॉक स्तर पर सुनवाई की व्यवस्था की। उसने लिखित रसीद देना भी अनिवार्य किया।
कोर्ट ने प्रतिनिधि की मदद लेने की अनुमति भी दी। इसमें परिजन और पार्टी कार्यकर्ता शामिल हैं।
कानून-व्यवस्था को लेकर कोर्ट ने राज्य सरकार को जिम्मेदार ठहराया। उसने जिला अधिकारियों और पुलिस को सतर्क रहने को कहा।
कोर्ट ने सात तरह की विसंगतियों की पहचान भी की। इनमें पुराने रिकॉर्ड से नाम गायब होना, उम्र का अंतर और पारिवारिक गड़बड़ी शामिल हैं।
ममता ने चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पत्र भी लिखा है। उन्होंने प्रक्रिया को नौकरशाही हस्तक्षेप बताया है। उन्होंने कहा कि इससे गरीब और वंचित वर्ग प्रभावित होता है।
हालांकि कई टीएमसी नेता पहले ही कोर्ट पहुंच चुके हैं, लेकिन ममता का खुद उतरना इस लड़ाई को खास बनाता है।
अब सबकी नजर सुप्रीम कोर्ट पर है। यह मामला 2026 के चुनाव से पहले बेहद अहम माना जा रहा है।