महाराष्ट्र में मेयर की जंग तेज, एमएनएस का शिंदे सेना को समर्थन, बीजेपी–कांग्रेस में अंदरूनी खींचतान

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महाराष्ट्र में नगर निकाय चुनाव नतीजों के बाद सियासी तापमान तेजी से बढ़ रहा है। मेयर पद की दौड़ ने गठबंधनों की परीक्षा ले ली है। कई पुराने समीकरण दबाव में हैं। नए राजनीतिक समीकरण उभर रहे हैं।

सबसे बड़ा घटनाक्रम कल्याण-डोंबिवली नगर निगम से सामने आया है। यहां राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना ने एकनाथ शिंदे की शिवसेना को समर्थन दिया है। इस कदम ने स्थानीय राजनीति की दिशा बदल दी है। साथ ही, ठाकरे भाइयों के बीच हालिया नजदीकी को भी झटका लगा है।

चुनाव नतीजों के बाद कई दलों ने जोड़-तोड़ तेज कर दी है। नेता विरोधी दलों के पार्षदों से संपर्क साध रहे हैं। पुराने विरोध भी अब सत्ता के रास्ते में आड़े नहीं आ रहे। कोल्हापुर, चंद्रपुर, मालेगांव, कल्याण-डोंबिवली, उल्हासनगर और मुंबई में यही तस्वीर दिख रही है।

कल्याण-डोंबिवली में शिंदे गुट बहुमत के करीब पहुंचना चाहता है। एमएनएस के समर्थन से उसकी स्थिति मजबूत हुई है। इसके उलट, उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) दबाव में आ गई है। पार्टी के 11 में से चार पार्षद चुनाव के बाद संपर्क में नहीं रहे। इससे दलबदल की अटकलें तेज हुईं।

इसी बीच, मुंबई से एक और संकेत मिला। शिवसेना (यूबीटी) की नवनिर्वाचित पार्षद सरिता म्हस्के कुछ समय तक संपर्क से बाहर रहीं। बाद में पार्टी ने उनकी वापसी की घोषणा की। इससे पहले कयास लगे थे कि वह शिंदे गुट में जा सकती हैं।

इस पूरे घटनाक्रम पर संजय राउत ने प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि उन्होंने राज ठाकरे से बात की है। राउत के मुताबिक, राज ठाकरे इस फैसले से नाराज़ हैं। उन्होंने साफ कहा कि यह निर्णय स्थानीय स्तर पर हुआ है। एमएनएस नेतृत्व ने कोई औपचारिक आदेश नहीं दिया।

हालांकि, राजनीतिक असर साफ दिख रहा है। ठाकरे गुट की रणनीति कमजोर पड़ी है। शिंदे गुट की सौदेबाजी की ताकत बढ़ी है। आने वाले दिनों में इसका असर अन्य नगर निगमों पर भी पड़ सकता है।

इस बीच, शिवसेना और बीजेपी के रिश्तों में भी तनाव दिख रहा है। दोनों दलों ने कई जगह मिलकर चुनाव लड़ा था। अब सत्ता गठन के वक्त मतभेद सामने आ रहे हैं। कल्याण में शिंदे की आक्रामक रणनीति से बीजेपी असहज महसूस कर रही है।

उल्हासनगर में स्थिति और पेचीदा है। यहां बीजेपी और शिवसेना ने अलग-अलग चुनाव लड़ा। 78 सदस्यीय सदन में बीजेपी के पास 37 सीटें हैं। शिवसेना के पास 36 सीटें हैं। बहुमत का आंकड़ा 40 है।

इस अंतर को पाटने के लिए शिंदे गुट ने समर्थन जुटाया। उसे वंचित बहुजन आघाड़ी के दो पार्षदों और एक निर्दलीय का साथ मिला। इससे शिंदे गुट बहुमत के करीब पहुंच गया। इस कदम ने बीजेपी को हाशिये पर ला दिया है।

दूसरी ओर, चंद्रपुर में बीजेपी और कांग्रेस आमने-सामने हैं। कांग्रेस 27 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। बीजेपी के पास 23 सीटें हैं। कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि बीजेपी सत्ता बचाने के लिए निर्दलीयों और विपक्षी पार्षदों से संपर्क कर रही है।

बीजेपी नेता सुधीर मुनगंटीवार ने इन चर्चाओं की पुष्टि की। उन्होंने कहा कि कांग्रेस के कई पार्षद बीजेपी के संपर्क में हैं। उन्होंने दावा किया कि पार्टी का मकसद शहर का विकास है, न कि केवल सत्ता।

हालांकि, दोनों दल अंदरूनी कलह से भी जूझ रहे हैं। बीजेपी में मुनगंटीवार और किशोर जोरगेवार गुट आमने-सामने हैं। कांग्रेस में विजय वडेट्टीवार और सांसद प्रतिभा धानोरकर के समर्थक अलग राह पर हैं।

कुल मिलाकर, मेयर की दौड़ ने महाराष्ट्र की स्थानीय राजनीति को अस्थिर कर दिया है। बहुमत से ज्यादा अहम अब सौदेबाजी बन गई है। आने वाले दिन तय करेंगे कि सत्ता किसके हाथ जाती है।


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