मणिपुर की जातीय हिंसा से जुड़ा एक दर्दनाक मामला फिर सुर्खियों में आया। कुकी-जो समुदाय की 20 वर्षीय युवती, जिसने 2023 के दंगों के दौरान अपहरण और गैंगरेप का आरोप लगाया था, इलाज के दौरान दम तोड़ गई। परिवार और समुदाय संगठनों ने मौत की पुष्टि की और न्याय की मांग दोहराई।
सबसे पहले, युवती ने मई 2023 में अपने साथ हुए अपराध की शिकायत दर्ज कराई थी। उस समय मणिपुर में मेइती और कुकी-जो समुदायों के बीच भीषण हिंसा चल रही थी। संघर्ष ने राज्य को लंबे समय तक अस्थिर रखा।
परिजनों के अनुसार, युवती 10 जनवरी को गुवाहाटी के एक अस्पताल में चल रहे इलाज के दौरान चल बसी। वह लगभग तीन साल से शारीरिक और मानसिक आघात से जूझ रही थी। डॉक्टरों ने कई बार उसकी हालत गंभीर बताई।
युवती ने अपने बयान में कहा था कि 15 मई 2023 को कुछ लोगों ने उसे इंफाल के न्यू चेकॉन इलाके के एक एटीएम बूथ से अगवा किया। इसके बाद हमलावरों ने उसे शहर के कई स्थानों पर ले जाकर घंटों तक प्रताड़ित किया।
उसने आरोप लगाया कि कई आरोपी अरामबाई तेंगोल से जुड़े थे। बाद में एक ऑटो चालक ने उसकी हालत देखी और उसे बचाने में मदद की। इसके बाद स्थानीय लोगों ने उसे राहत शिविर पहुंचाया।
शुरुआत में उसे कांगपोकपी जिले के राहत कैंप में रखा गया। फिर डॉक्टरों ने उसे मणिपुर और नागालैंड के अस्पतालों में भर्ती किया। हालत बिगड़ने पर परिवार ने उसे गुवाहाटी शिफ्ट कराया।
इसी बीच, इंडिजिनस ट्राइबल लीडर्स फोरम (आईटीएलएफ) ने युवती की मौत के बाद विस्तृत बयान जारी किया। संगठन ने आरोप लगाया कि मेइती महिला समूह ‘मेइरा पैबी’ ने पहले युवती का अपहरण किया और फिर उसे अरामबाई तेंगोल के लोगों को सौंप दिया।
आईटीएलएफ ने दावा किया कि हमलावर युवती को लैंगोल ले गए, वहां उसके साथ यौन हिंसा की और बाद में उसे बिष्णुपुर में छोड़ दिया। संगठन ने कहा कि इस हमले से उसके गर्भाशय को गंभीर नुकसान पहुंचा।
संगठन के मुताबिक, शारीरिक चोटों के साथ-साथ युवती गहरे मानसिक तनाव में रही। बार-बार संक्रमण और आंतरिक जटिलताओं ने उसकी हालत लगातार कमजोर की। अंततः इलाज के बावजूद वह जीवन नहीं बचा सकी।
गौरतलब है कि यह घटना मणिपुर में भड़की व्यापक जातीय हिंसा के दौरान हुई। उस संघर्ष में 260 से अधिक लोगों की जान गई और हजारों परिवारों ने घर छोड़े।
युवती ने पहले एक वीडियो संदेश भी जारी किया था। उसने आरोपियों पर कार्रवाई की मांग की। उसने कहा कि पुलिस में एफआईआर दर्ज हुई, लेकिन जांच आगे नहीं बढ़ी।
उसकी मौत के बाद कुकी-जो संगठनों ने नाराजगी जताई। कोटू के प्रवक्ता एनजी लुन किपजेन ने न्याय प्रणाली पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि ऐसी घटनाएं समुदाय के भीतर असुरक्षा की भावना बढ़ाती हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि न्याय की कमी अलग प्रशासनिक व्यवस्था की मांग को मजबूत करती है। कुकी-जो समूह लगातार सुरक्षा और अधिकारों की बात उठाते रहे हैं।
पुलिस सूत्रों के अनुसार, अधिकारियों ने मामले में जीरो एफआईआर दर्ज की थी। बाद में एजेंसियों ने केस सीबीआई को सौंपा। हालांकि अब तक किसी गिरफ्तारी की आधिकारिक पुष्टि सामने नहीं आई।
यह मामला एक बार फिर संघर्ष क्षेत्रों में महिलाओं की सुरक्षा और न्याय व्यवस्था की गंभीर चुनौतियों को उजागर करता है।