सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद HC के जस्टिस यशवंत वर्मा की चुनौती खारिज की, पार्लियामेंटरी पैनल जांच आगे बढ़ेगी

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नई दिल्ली – इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा के लिए शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा झटका दिया। शीर्ष न्यायालय ने उनका वह याचिका खारिज कर दी, जिसमें उन्होंने लोकसभा स्पीकर के उस निर्णय को चुनौती दी थी, जिसने उनके खिलाफ हटाने की प्रस्तावना को स्वीकार किया। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने पार्लियामेंटरी पैनल की जांच की वैधता को चुनौती देने वाली याचिका को भी खारिज कर दिया।

जस्टिस दीपांकर दत्ता और एससी शर्मा की पीठ, जिसने 8 जनवरी को याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रखा था, ने शुक्रवार को आदेश सुनाया। कोर्ट ने जस्टिस वर्मा के तर्कों को खारिज करते हुए कहा कि उनकी कार्यप्रणाली भरोसा जगाने वाली नहीं रही।

वर्मा ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी कि लोकसभा स्पीकर ने Judges (Inquiry) Act, 1968 के तहत बिना सहमति के समिति का गठन किया। उन्होंने तर्क दिया कि यह कार्रवाई उनके समान अधिकार और कानून के तहत सुरक्षा के अधिकार का उल्लंघन करती है। वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने उनकी पैरवी की। वर्मा ने यह भी कहा कि दोनों सदनों में हटाने की नोटिस एक ही दिन दी गई थी, लेकिन स्पीकर ने एकतरफा कार्रवाई की।

इस विवाद ने 15 मार्च, पिछले साल, आग लगने के बाद उग्र रूप ले लिया। दिल्ली स्थित जस्टिस वर्मा के बंगले में फायर ब्रिगेड पहुंची और आग में जलाए गए पैसों के ढेर मिले। इस घटना ने देश की न्याय व्यवस्था में भ्रष्टाचार के सवाल खड़े कर दिए।

जस्टिस वर्मा ने पैसों से अपने संबंध को नकारा और आरोपों को “असंगत” बताया। इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने एक इन-हाउस पैनल बनाया। पैनल ने उनकी महाभियोग की सिफारिश की। यह रिपोर्ट राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना के जरिए भेजी गई।

इसके बाद जस्टिस वर्मा ने सुप्रीम कोर्ट में पैनल की सिफारिश को चुनौती देने के लिए याचिका दायर की। याचिका में उन्होंने अपनी पहचान छुपाई और कोर्ट दस्तावेजों में उन्हें ‘XXX’ कहा गया।

याचिका में वर्मा ने पांच तर्क पेश किए। उन्होंने इन-हाउस पैनल की जांच अधिकार और विधिक क्षमता पर सवाल उठाए। उन्होंने यह भी चुनौती दी कि स्पीकर का एकतरफा निर्णय सही नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने सभी तर्क खारिज कर दिए। कोर्ट ने कहा कि यह याचिका “सुनवाई योग्य नहीं” है। साथ ही जस्टिस वर्मा की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा कि यह “भरोसा जगाने वाली नहीं रही।”

इस निर्णय के बाद पार्लियामेंटरी पैनल की जांच बिना किसी कानूनी रुकावट के आगे बढ़ेगी। अब ध्यान पैनल की रिपोर्ट और संसद में आगामी कदमों की ओर होगा। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया कि जस्टिस वर्मा की चुनौती असफल रही और प्रक्रिया पर कोई असर नहीं पड़ेगा।


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