आईपीएसी मनी लॉन्ड्रिंग जांच पर सुप्रीम कोर्ट में ED-TMC आमने-सामने, तृणमूल ने लगाए ‘फोरम शॉपिंग’ के आरोप

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सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को एक हाई-प्रोफाइल कानूनी टकराव सामने आया। प्रवर्तन निदेशालय और पश्चिम बंगाल सरकार आमने-सामने दिखे। मामला आईपीएसी से जुड़ी कथित मनी लॉन्ड्रिंग जांच का है। इस सुनवाई ने राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर हलचल तेज कर दी।

सबसे पहले, मामले की पृष्ठभूमि सामने आई। ED ने 2020 के कोयला तस्करी घोटाले से जुड़े धन के प्रवाह की जांच शुरू की। एजेंसी ने जांच के दौरान आईपीएसी और उससे जुड़े प्रीतिक जैन पर छापे मारे। ED का दावा है कि जांच में संदिग्ध वित्तीय लेन-देन के संकेत मिले।

इसके बाद, तृणमूल कांग्रेस ने समय को लेकर सवाल उठाए। पार्टी ने कहा कि छापे 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले पड़े। TMC ने इसे राजनीतिक दबाव से जोड़ा। पार्टी नेताओं ने कहा कि जांच की टाइमिंग संदेह पैदा करती है।

सुनवाई के दौरान, पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने दलील रखी। उन्होंने ED पर ‘फोरम शॉपिंग’ का आरोप लगाया। उनके अनुसार, एजेंसी एक साथ कलकत्ता हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट पहुंची। उन्होंने कहा कि यह तरीका कानूनी प्रक्रिया के खिलाफ जाता है।

आगे, सिंघवी ने अदालत को बताया कि एक ही मुद्दे पर समानांतर सुनवाई से भ्रम पैदा होता है। उन्होंने कहा कि कानून ऐसी रणनीति को हतोत्साहित करता है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से हस्तक्षेप की मांग की और निष्पक्षता बनाए रखने पर जोर दिया।

दूसरी ओर, ED ने अपने कदमों का बचाव किया। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने एजेंसी की तरफ से पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि जांच ठोस सबूतों पर आधारित है। उन्होंने आरोप लगाया कि 2022 के गोवा चुनाव के दौरान 20 करोड़ रुपये से अधिक की राशि हवाला नेटवर्क के जरिए आईपीएसी तक पहुंची।

ED के अनुसार, इस धन का इस्तेमाल चुनावी रणनीति और अन्य गतिविधियों में हुआ। एजेंसी ने कहा कि वित्तीय अपराध की जांच उसका वैधानिक कर्तव्य है। ED ने साफ किया कि राजनीतिक कोण जांच का आधार नहीं है।

इसके जवाब में, TMC ने आरोपों को खारिज किया। ममता बनर्जी की ओर से पेश वकीलों ने कहा कि ED जांच की आड़ में राजनीतिक डेटा तक पहुंच चाहती है। उन्होंने आरोप लगाया कि एजेंसी राजनीतिक ब्लूप्रिंट “चुराने” की कोशिश कर रही है।

इसके अलावा, TMC ने संघीय ढांचे का मुद्दा उठाया। पार्टी ने कहा कि केंद्र की एजेंसियां विपक्ष शासित राज्यों को निशाना बना रही हैं। उन्होंने इसे लोकतांत्रिक संतुलन के लिए खतरा बताया।

सुनवाई के दौरान, न्यायाधीशों ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनीं। बेंच ने अधिकार क्षेत्र और प्रक्रिया पर सवाल पूछे। अदालत ने यह भी देखा कि क्या समानांतर याचिकाएं उचित हैं।

पृष्ठभूमि में देखें तो पश्चिम बंगाल में राजनीतिक माहौल पहले से गर्म है। 2026 के चुनाव नजदीक आते ही आरोप-प्रत्यारोप तेज हो रहे हैं। इस मामले ने उस माहौल को और तीखा कर दिया है।

फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट मामले की जांच कर रहा है। अदालत आगे दिशा-निर्देश दे सकती है। इस फैसले का असर जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर पड़ सकता है। साथ ही, यह राजनीति और कानून के रिश्ते को भी नई दिशा दे सकता है।


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