भारत में 50 साल बाद कोयला आधारित बिजली उत्पादन में गिरावट, नवीकरणीय ऊर्जा बनी बड़ा कारण
भारत के बिजली क्षेत्र में एक ऐतिहासिक बदलाव सामने आया है। पहली बार पिछले 50 वर्षों में कोयला आधारित बिजली उत्पादन साल-दर-साल घटा है। यह गिरावट वर्ष 2025 में दर्ज हुई। साथ ही नवीकरणीय ऊर्जा ने तेज रफ्तार पकड़ी। इसी वजह से बिजली उत्पादन का संतुलन बदला।
सबसे पहले आंकड़ों पर नजर डालें। ऊर्जा और स्वच्छ वायु अनुसंधान केंद्र (CREA) की रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने 2025 में कोयला आधारित संयंत्रों से 1,283 अरब यूनिट बिजली पैदा की। यह उत्पादन 2024 के 1,322 अरब यूनिट से करीब 3 प्रतिशत कम रहा। हालांकि इसके बावजूद कुल बिजली उत्पादन लगभग 1 प्रतिशत बढ़ा। इसका सीधा मतलब है कि अन्य स्रोतों ने इस कमी की भरपाई की।
दरअसल, यह बदलाव अचानक नहीं आया। पिछले कुछ वर्षों से कोयला आधारित बिजली उत्पादन की रफ्तार धीमी हो रही थी। उदाहरण के तौर पर, 2023 में कोयला बिजली उत्पादन 15 प्रतिशत बढ़ा था। लेकिन 2024 में यह वृद्धि घटकर 5 प्रतिशत रह गई। अब 2025 में इसमें सीधी गिरावट दर्ज हुई।
इसके अलावा, साल 2022 में भी कोयला उत्पादन में कमी दिखी थी। उस समय कोविड महामारी के कारण औद्योगिक गतिविधियां कमजोर पड़ी थीं। लेकिन 2025 की गिरावट अलग है। इस बार वजह मांग में गिरावट नहीं, बल्कि ऊर्जा स्रोतों में बदलाव रहा।
अब नवीकरणीय ऊर्जा की भूमिका समझना जरूरी है। 2025 में सौर और पवन जैसी नवीकरणीय ऊर्जा से बिजली उत्पादन 22 प्रतिशत बढ़ा। यह उत्पादन 221 अरब यूनिट से बढ़कर 270 अरब यूनिट पहुंच गया। वहीं, बड़े जलविद्युत संयंत्रों से उत्पादन भी 15 प्रतिशत बढ़कर 180 अरब यूनिट हो गया। साफ है कि स्वच्छ ऊर्जा ने कोयले की जगह ली।
इसी बीच मौसम ने भी भूमिका निभाई। 2025 में गर्मी अपेक्षाकृत कम रही। इसके चलते बिजली की मांग में तेज उछाल नहीं आया। इसलिए कोयला संयंत्रों पर दबाव भी घटा।
अब आगे की तस्वीर और दिलचस्प हो जाती है। CREA का कहना है कि भारत को 2030 तक कोयला क्षमता बढ़ाने की योजनाओं पर फिर से विचार करना चाहिए। देश पहले ही बड़े कोयला बेड़े के साथ खड़ा है। इसके अलावा कई कोयला परियोजनाएं निर्माणाधीन हैं। साथ ही नवीकरणीय ऊर्जा और बैटरी स्टोरेज की मजबूत पाइपलाइन मौजूद है। ऐसे में नई कोयला परियोजनाओं की जरूरत सीमित दिखती है।
रिपोर्ट यह भी बताती है कि सबसे अधिक मांग वाले दिनों में भी पूरे कोयला बेड़े की जरूरत नहीं पड़ती। उस समय नवीकरणीय ऊर्जा पीक आवर सप्लाई में अहम भूमिका निभा रही है।
इस बदलाव का असर उत्सर्जन पर भी दिखा। पिछले साल सितंबर में CREA ने Carbon Brief के लिए एक अध्ययन किया। उस अध्ययन में सामने आया कि 2025 की पहली छमाही में भारत के बिजली क्षेत्र से कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन घटा। यह पहली बार हुआ जब किसी छमाही में उत्सर्जन कम हुआ।
वैश्विक स्तर पर भी यही रुझान दिखता है। चीन में भी 2025 में कोयला आधारित बिजली उत्पादन 1.6 प्रतिशत घटा। वहां भी यह 50 साल में पहली वार्षिक गिरावट रही। भारत और चीन दुनिया के सबसे बड़े उत्सर्जकों में शामिल हैं। दोनों के बिजली क्षेत्रों ने 2015 से 2024 के बीच वैश्विक उत्सर्जन वृद्धि का बड़ा हिस्सा जोड़ा था।
अब तस्वीर बदल रही है। नवीकरणीय ऊर्जा की तेज बढ़त ने कोयले की पकड़ ढीली की है। आने वाले वर्षों में यह बदलाव और गहरा हो सकता है।
