महाराष्ट्र चुनाव मोड में प्रवेश करता है। राज्य निर्वाचन आयोग तारीखें घोषित करता है। आयोग 15 जनवरी को मतदान तय करता है। वह 16 जनवरी को मतगणना रखता है। इसलिए चुनावी दौड़ तेज़ हो जाती है।
आयोग 29 महानगरपालिकाएँ सूचीबद्ध करता है। कुल 2,869 सीटें दांव पर रखता है। मुंबई, नवी मुंबई और ठाणे मुकाबले को तीखा बनाते हैं। पुणे, नाशिक और नागपुर भी तस्वीर बदलते हैं। साथ ही छत्रपति संभाजीनगर भी मैदान में उतरता है। हर शहर स्थानीय मुद्दे उठाता है। फिर भी हर शहर राज्य की राजनीति को दिशा देता है।
अब दल रणनीति बनाते हैं। BJP हालिया विधानसभा जीत से उत्साह पाती है। पार्टी संगठन बूथों पर पहुँच बनाता है। कार्यकर्ता घर-घर संपर्क बढ़ाते हैं। उधर विपक्ष तालमेल खोजता है। नेता सीट बंटवारे पर बातचीत करते हैं। कई जिलों में खींचतान बढ़ती है।
इस बीच नए आरोप उभरते हैं। कुछ नेता कांग्रेस और BJP पर “चुपचाप समझौते” का दावा करते हैं। वे चुनिंदा वार्ड में दोस्ताना मुकाबले की बात करते हैं। कांग्रेस नेता आरोपों को खारिज करते हैं। BJP नेता बयान को अफवाह बताते हैं। हालांकि बहस फैलती है। इसलिए मतदाता सवाल उठाते हैं।
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस आक्रामक अभियान शुरू करते हैं। वह मुंबई, पुणे और नागपुर में दर्जनों रैलियाँ करते हैं। फिर अन्य शहरों का दौरा बढ़ाते हैं। वह तेज़ काम, स्वच्छता और सुरक्षा को मुद्दा बनाते हैं। साथ ही वह विपक्ष पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हैं। मंचों पर भीड़ उमड़ती है। नारे गूंजते हैं। माहौल गर्म रहता है।
राज्य अध्यक्ष रविंद्र चव्हाण भी मोर्चा संभालते हैं। वह लगातार सभाएँ करते हैं। चुनाव प्रभारी चंद्रशेखर बावनकुले बूथ तंत्र मजबूत करते हैं। डेटा टीमें वार्ड-वार रिपोर्ट तैयार करती हैं। सोशल मीडिया अभियान को गति देता है। इसलिए पार्टी पूरे सूबे में तालमेल रखती है।
उधर कांग्रेस साझेदारी मजबूत करने की कोशिश करती है। उसके नेता सहयोगियों से बैठकें करते हैं। वे पारदर्शिता और सस्ती सेवाओं का वादा रखते हैं। वे BJP पर सत्ता राजनीति का आरोप लगाते हैं। हालांकि टिकट विवाद कई जगह अड़चनें पैदा करते हैं। कुछ नेता असंतोष जताते हैं। फिर बातचीत शुरू होती है।
शिवसेना के दोनों गुट अपनी पहचान पर ज़ोर देते हैं। वे मराठी अस्मिता की अपील दोहराते हैं। कार्यकर्ता मोहल्लों में सक्रिय रहते हैं। नारेबाज़ी मुकाबले को तीखा बनाती है। NCP अपने गढ़ बचाने पर ध्यान देती है। उसके नेता महंगाई और बेरोज़गारी का मुद्दा उठाते हैं।
जमीनी स्तर पर लोग रोज़मर्रा की समस्याएँ बताते हैं। नागरिक नाली, कचरा और पानी पर सवाल करते हैं। युवा नौकरी और ट्रांसपोर्ट पर चर्चा करते हैं। व्यापारी लाइसेंस और टैक्स का बोझ गिनाते हैं। महिलाएँ सुरक्षा और स्वच्छता को प्राथमिकता देती हैं। इसलिए चुनाव स्थानीय जीवन पर सीधा असर डालता है।
अब समय कम रहता है। गाड़ियाँ मोहल्लों में घूमती हैं। नेता भीड़ जुटाते हैं। प्रशासन सुरक्षा योजना तैयार करता है। प्रशिक्षण टीमें मतदान कर्मियों को मार्गदर्शन देती हैं। दल मतदाताओं तक आखिरी अपील पहुँचाते हैं।
अंततः मतदाता फैसला करते हैं। वे वादों और काम का तुलनात्मक आकलन करते हैं। फिर वे शहरों की सत्ता की तस्वीर बदलते हैं। आरोप और गठजोड़ की कहानियाँ चलती रहती हैं। लेकिन बैलेट बॉक्स सच्चाई लिखता है।