जम्मू-कश्मीर में मेडिकल शिक्षा पर बड़ा सवाल खड़ा हुआ। राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) ने सख्त फैसला लिया। NMC ने श्री माता वैष्णो देवी इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल एक्सीलेंस से MBBS कोर्स की अनुमति वापस ली। आयोग ने न्यूनतम मानकों पर सीधी जांच की। फिर आयोग ने कई गंभीर कमियाँ दर्ज कीं।
सबसे पहले शिकायतें सामने आईं। छात्र बोले। डॉक्टरों ने चेतावनी दी। कर्मचारियों ने भी संकेत दिए। इसलिए आयोग ने अचानक निरीक्षण तय किया। टीम कॉलेज पहुँची। टीम ने वार्ड देखे। टीम ने लैब जाँची। टीम ने ओटी, ICU और कक्षाएँ परखी। परिणाम चौंकाने वाले निकले।
इसके बाद रिपोर्ट बनी। आयोग ने फैकल्टी में भारी कमी देखी। रेजिडेंट डॉक्टर कम मिले। मरीजों की संख्या भी कम दिखी। OPD में भीड़ नहीं मिली। बेड खाली रहे। ICU में सीमित उपयोग चला। डिलीवरी का औसत भी बहुत कम रहा। आयोग ने इसे “गंभीर कमी” कहा।
फिर मामला प्रशिक्षण तक पहुँचा। कई विभागों में प्रैक्टिकल लैब नहीं मिली। रिसर्च लैब कमजोर दिखी। लेक्चर थिएटर मानकों से पीछे रहे। लाइब्रेरी में कम किताबें दिखीं। जर्नल लगभग न के बराबर मिले। उपकरण अधूरे रहे। केवल दो ऑपरेशन थियेटर चले। पाँच की जरूरत पड़ी।
इस बीच, NMC ने जोखिम आँका। आयोग ने कहा, ऐसी स्थिति में पढ़ाई प्रभावित होती है। भविष्य के डॉक्टर कमजोर प्रशिक्षण पाते हैं। इससे मरीज भी खतरे में आते हैं। इसलिए आयोग ने अनुमति रोक दी। आयोग ने नियमों का हवाला दिया। आयोग ने जिम्मेदारी तय की।
हालाँकि, आयोग ने छात्रों की चिंता समझी। आयोग ने राहत दी। NMC ने कहा, कोई छात्र सीट नहीं खोएगा। अब सरकार छात्रों को दूसरे सरकारी मेडिकल कॉलेजों में समायोजित करेगी। स्वास्थ्य विभाग प्रक्रिया संभालेगा। परामर्श टीमें मार्गदर्शन देंगी। छात्र अपनी पढ़ाई जारी रखेंगे।
उधर, कॉलेज पहले से विवाद झेल रहा था। 50 में से 46 मुस्लिम छात्रों का चयन हुआ। कुछ समूहों ने विरोध शुरू किया। उन्होंने आरक्षण की माँग उठाई। उन्होंने दानदाताओं का तर्क दिया। इससे माहौल गर्म हुआ। राजनीति भी जुड़ गई।
फिर नेताओं ने बयान दिए। उमर अब्दुल्ला ने सरकार से अपील की। उन्होंने कहा, छात्रों ने मेहनत से सीट ली। उन्होंने सांप्रदायिक बहस का विरोध किया। उन्होंने छात्रों को सुरक्षित कॉलेजों में भेजने की सलाह दी। उन्होंने कॉलेज बंद करने का सुझाव भी दिया, अगर मानक पूरे न हों।
इसी दौरान, कुछ संगठनों ने अभियान चलाया। उन्होंने यात्राएँ निकालीं। उन्होंने हस्ताक्षर जुटाए। उन्होंने नई सूची की माँग रखी। इससे विवाद और गहरा गया।
अब चुनौती साफ दिख रही है। कॉलेज को खुद को सुधारना होगा। उसे ढाँचा मजबूत करना होगा। उसे योग्य फैकल्टी लानी होगी। उसे मरीजों की सेवाएँ बढ़ानी होंगी। तभी भरोसा लौटेगा।
अभी के लिए, छात्रों को नई राह मिल रही है। अभिभावक राहत महसूस करते हैं। NMC निगरानी का भरोसा दे रहा है। परिषदें स्थानांतरण की प्रक्रिया आगे बढ़ा रही हैं।
अंत में, यह प्रकरण एक संदेश देता है। चिकित्सा शिक्षा को सख्त मानक चाहिए। नियामक समझौता नहीं करेंगे। और छात्र गुणवत्तापूर्ण प्रशिक्षण के हकदार हैं — बिना दबाव, बिना राजनीति, केवल सीखने और सेवा के साथ।