नागपुर की राजनीति में नया विवाद खड़ा हुआ। AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने फिर सीधा वार किया। उन्होंने भाजपा नेता नवनीत राणा के “चार बच्चे” वाले बयान पर खुलकर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा, “मेरे छह बच्चे हैं। आप आठ क्यों नहीं करतीं? आपको कौन रोकता है?”
सबसे पहले, घटना समझते हैं। नवनीत राणा ने हाल ही में एक सभा में बयान दिया। उन्होंने कहा कि लोगों को तीन या चार बच्चे पैदा करने चाहिए। उनका तर्क यह रहा कि इससे देश का जनसांख्यिक संतुलन सुरक्षित रहता है। उन्होंने कुछ समुदायों पर जनसंख्या बढ़ाने का आरोप लगाया और लोगों से “संख्या बढ़ाने” की अपील की।
ओवैसी ने इस टिप्पणी पर जवाब दिया। उन्होंने महाराष्ट्र के अकोला में रैली की। उन्होंने सीधे चुनौती दी। उन्होंने कहा, “आप लोग कहते हैं कि ज्यादा बच्चे पैदा करो। फिर आप खुद क्यों नहीं कर रहे? मैं आपको चुनौती देता हूं — बीस बच्चे पैदा करो। यह कैसा मजाक है?”
इसके बाद, उन्होंने पृष्ठभूमि भी याद दिलाई। उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत के बयानों का उल्लेख किया। फिर उन्होंने आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा, “कई नेता लोगों को ज्यादा बच्चे पैदा करने की सलाह देते हैं। मगर वे खुद जिम्मेदारी से बात नहीं करते।”
इधर, कांग्रेस ने भी इस विवाद में कूदकर प्रतिक्रिया दी। कांग्रेस सांसद मणिकम टैगोर ने कड़ा रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि देश को वैज्ञानिक तौर-तरीकों की जरूरत है। उन्होंने जोड़ा कि अंधविश्वास और डर फैलाने वाली राजनीति देश को नुकसान पहुंचाती है। उन्होंने कहा, “हमारे सामने जनसंख्या प्रबंधन की चुनौती खड़ी है। हमें समझदारी चाहिए, न कि अतिरंजित बयानबाजी।”
इस पूरे विवाद ने बड़ा सवाल खड़ा किया। नेता जनसंख्या के मुद्दे को चुनावी भाषणों में क्यों बदल देते हैं? समाज को डर और संदेह के बीच क्यों धकेलते हैं? जबकि सरकार को स्वास्थ्य, शिक्षा और आजीविका पर ध्यान देना चाहिए।
इसी दौरान, ओवैसी ने एक और बात स्पष्ट की। उन्होंने कहा कि परिवार का फैसला निजी विकल्प बनना चाहिए। राज्य को उस पर हावी नहीं होना चाहिए। उन्होंने दावा किया कि कुछ नेता लोगों पर दबाव डालते हैं। वे संख्या को राजनीति का साधन बनाते हैं।
अब आगे देखते हैं। बयानबाज़ी जारी रहती है। ट्विटर और टीवी पर बहस तेज होती है। समर्थक अपने-अपने पक्ष रखते हैं। लेकिन आम लोग वास्तविक मुद्दा पूछते हैं — रोज़गार क्या बढ़ रहा है? शिक्षा कैसे बेहतर होगी? स्वास्थ्य सेवा कितनी मजबूत बनेगी?
अंत में, यह विवाद याद दिलाता है कि शब्द मायने रखते हैं। नेता जब बोलते हैं, तो समाज प्रतिक्रिया देता है। इसलिए राजनीति को जिम्मेदारी दिखानी चाहिए। और नागरिकों को तथ्य देखने चाहिए, न कि केवल नारों पर भरोसा करना चाहिए।
इस तरह, ओवैसी ने पलटवार किया। राणा अपने बयान पर कायम रहीं। बहस बढ़ी। और देश ने देखा कि जनसंख्या का मुद्दा फिर राजनीति के केंद्र में आ गया।