डोनाल्ड ट्रम्प फिर व्यापार पर सख्त रुख दिखाते हैं। वह एयर फ़ोर्स वन पर पत्रकारों से बात करते हैं। वह रूस से तेल खरीद पर भारत को निशाना बनाते हैं। वह कहते हैं कि पीएम नरेंद्र मोदी उनकी नाराज़गी समझते हैं। फिर वह कहते हैं कि वह नए टैरिफ बहुत जल्दी लगा सकते हैं।
ट्रम्प मोदी की तारीफ भी करते हैं। वह कहते हैं कि मोदी “अच्छे इंसान” हैं। फिर भी, वह रूस से तेल के सौदे का मुद्दा उठाते हैं। वह कहते हैं कि भारत खरीद जारी रखता है। इसलिए वह टैरिफ को हथियार बनाते हैं। वह दावा करते हैं कि टैरिफ बात-चीत से तेज काम करते हैं।
पिछले साल ट्रम्प ने टैरिफ बढ़ा दिए। वह 25 प्रतिशत का रेसिप्रोकल टैरिफ लगाते हैं। फिर वह रूसी तेल की खरीद पर और 25 प्रतिशत जोड़ते हैं। कुछ श्रेणियों में टैरिफ 50 प्रतिशत तक पहुँचते हैं। नतीजतन, तनाव बढ़ता है। नई दिल्ली अपने हितों की बात रखती है। वॉशिंगटन बाज़ार खोलने की मांग रखता है। संबंधों में खिंचाव आता है।
इसके बावजूद, दोनों नेता बात जारी रखते हैं। कुछ हफ्ते पहले दोनों की फोन पर बातचीत होती है। दोनों बढ़ते व्यापार की जरूरत पर जोर देते हैं। दोनों स्वीकार करते हैं कि तनाव मौजूद है। उसी दिन दोनों देश नए दौर की बातचीत शुरू करते हैं। एजेंडा टैरिफ पर टिकता है। कृषि और मार्केट एक्सेस भी जुड़ते हैं। बातचीत आगे बढ़ती है, मगर दूरी बनी रहती है।
इससे पहले ट्रम्प खेती के मुद्दे की ओर बढ़ते हैं। व्हाइट हाउस में किसानों की बैठक होती है। एक प्रतिनिधि भारत, चीन और थाईलैंड पर चावल डंपिंग का आरोप लगाता है। ट्रम्प तुरंत सवाल पूछते हैं। वह कहते हैं—भारत ऐसा क्यों करता है? वह छूट पर सवाल उठाते हैं। वह कहते हैं कि टैरिफ समस्या दो मिनट में सुलझाते हैं। यह बयान कड़ा संदेश भेजता है।
अब बातचीत फिर अटकती दिखती है। अमेरिका भारतीय कृषि पर ऊंचे टैरिफ रोकना चाहता है। अमेरिकी वार्ताकार बड़े बाज़ार की मांग रखते हैं। भारत अलग तर्क देता है। भारत छोटे किसानों की बात रखता है। भारत खाद्य सुरक्षा को प्राथमिकता देता है। इसलिए भारत खेती और डेयरी को सुरक्षा देता है। सरकार संतुलन का आग्रह रखती है।
इधर, भारत सहयोग का रास्ता भी तलाशता है। वह निवेश, तकनीक और सप्लाई-चेन पर जोर देता है। उधर, अमेरिका नियमों में स्थिरता चाहता है। दोनों देश व्यापक तस्वीर देखते हैं। ऊर्जा बाज़ार में उथल-पुथल जारी रहती है। युद्ध और प्रतिबंध माहौल बदल देते हैं। इसलिए हर फैसला रणनीतिक असर पैदा करता है।
ट्रम्प फिर टैरिफ को समाधान बताते हैं। समर्थक ताकत देखते हैं। आलोचक महंगाई और टकराव की चेतावनी देते हैं। चुनावी माहौल इस बहस को तेज करता है। कारोबारी समुदाय सतर्क रहता है। ऊर्जा बाज़ार हर संकेत पर नजर रखता है।
अब अगला चरण निर्णायक बनता है। वार्ताकार फिर मिलते हैं। दोनों पक्ष लचीलापन खोजते हैं। दोनों रिश्ते को महत्व देते हैं। आने वाले सप्ताह परीक्षा लाते हैं। या तो समझौता आगे बढ़ता है। या फिर नया टैरिफ दौर शुरू होता है।