धर्मशाला छात्रा मौत मामला: आरोपी प्रोफेसर बोले—दोष साबित हुआ तो सज़ा स्वीकार करूँगा

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धर्मशाला में न्याय की आवाज़ तेज होती है। एक 19 वर्षीय छात्रा की मौत कई सवाल उठाती है। परिवार आरोप लगाता है। वे कहते हैं कि कॉलेज की तीन लड़कियाँ रैगिंग करती रहीं। वे यह भी कहते हैं कि असिस्टेंट प्रोफेसर अशोक कुमार ने यौन शोषण किया। परिवार मुकदमा दर्ज कराता है। मामला पूरे हिमाचल में चर्चा बन जाता है।

फिर सरकार कदम उठाती है। अधिकारी प्रोफेसर को निलंबित करते हैं। मुख्यमंत्री कार्यालय शिकायत पर ध्यान देता है। पुलिस विशेष टीम बनाती है। जांच शुरू होती है। अदालत भी सामने आती है। धर्मशाला की अदालत प्रोफेसर को अग्रिम ज़मानत देती है। अदालत उनसे पूछताछ में सहयोग की शर्त रखती है।

इसके बाद अशोक कुमार मीडिया से बात करते हैं। वे आरोप ख़ारिज करते हैं। वे कहते हैं, “मैंने पिछले सेमेस्टर में उसे पढ़ाया।” वे जोड़ते हैं, “अब दूसरा शिक्षक उसकी कक्षा लेता है।” वे कहते हैं कि उनका इस प्रकरण से कोई संबंध नहीं है। फिर भी वे स्वीकार करते हैं कि मामला गंभीर है। वे कहते हैं, “जांच सच सामने लाएगी। अदालत दोष साबित करेगी तो मैं परिणाम स्वीकार करूँगा।”

अब कहानी नया मोड़ लेती है। सोशल मीडिया पर एक वीडियो सामने आता है। वीडियो में छात्रा अपनी पीड़ा बताती है। वह अनुचित व्यवहार, मानसिक दबाव और धमकी का आरोप लगाती है। यह वीडियो गुस्सा बढ़ाता है। छात्र संगठन विरोध करते हैं। अभिभावक सुरक्षा की माँग करते हैं।

इसी दौरान सरकार दूसरी कार्रवाई करती है। शिक्षा विभाग चार सदस्यीय समिति बनाता है। अधिकारी तीन दिन की समयसीमा तय करते हैं। मंत्री रोहित ठाकुर सख्त रुख दिखाते हैं। वे कहते हैं कि सरकार दोषियों पर कड़ी कार्रवाई करेगी। साथ-साथ पुलिस जांच भी चलती है।

इसके बाद यूजीसी भी कदम उठाता है। आयोग पाँच सदस्यीय तथ्य-खोज समिति गठित करता है। टीम कॉलेज का माहौल देखती है। टीम यह भी देखती है कि किसने क्या किया और किसने क्या नहीं किया। लक्ष्य साफ रहता है—सच सामने लाना।

उधर कॉलेज प्रशासन अपनी जानकारी साझा करता है। प्रिंसिपल बताते हैं कि छात्रा पहले वर्ष में पढ़ती थी। फिर वह कुछ समय के लिए दूसरे वर्ष की कक्षा में बैठती रही। नतीजे आते हैं। तीन विषयों में फेल हो जाती है। नियम के अनुसार उसे साल दोहराना पड़ता। प्रिंसिपल कहते हैं कि उसने दोबारा प्रवेश नहीं लिया। वे कहते हैं कि कॉलेज को मामले की जानकारी पुलिस के आने पर मिली। वे जांच में सहयोग का दावा करते हैं।

अब समाज कई सवाल पूछता है। क्या सिस्टम छात्रों को सुरक्षित रखता है? क्या कॉलेज समय पर चेतावनी देख पाता है? और क्या जांच सच तक पहुँचती है?

उधर, प्रोफेसर अपनी बात दोहराते हैं। वे कहते हैं कि 26 साल की सेवा में ऐसा आरोप पहली बार सामने आया। वे कहते हैं कि वे सज़ा स्वीकार करेंगे, लेकिन निष्पक्ष सुनवाई चाहते हैं। वे कहते हैं कि “लड़की को न्याय मिले और मुझे भी।”

आखिर में मुद्दा स्पष्ट दिखता है। एक युवा जीवन खत्म हो गया। परिवार न्याय चाहता है। राज्य जवाबदेही चाहता है। जांच एजेंसियाँ हर बयान की जाँच करती हैं। अब अदालत, सरकार और समुदाय—सब मिलकर सच तलाशेंगे। आगे की राह यही तय करेगी कि धर्मशाला इस ट्रैजेडी से क्या सीख लेता है—और कैसे हर छात्रा के लिए सुरक्षित माहौल बनाता है।


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