महाराष्ट्र के स्थानीय चुनावों में बिना मुकाबले जीत पर बढ़ा विवाद

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महाराष्ट्र चुनावी माहौल में प्रवेश करता है। महायुति गठबंधन मैदान मजबूत करता है। विपक्ष तुरंत सवाल उठाता है। वह दबाव की बात करता है। वह पैसों के प्रलोभन की बात करता है। वह खेल बिगड़ने का आरोप लगाता है।

अब आंकड़े तस्वीर साफ करते हैं। कुल 2,869 सीटें दांव पर आती हैं। फिर भी, 69 सीटें बिना मुकाबले चली जाती हैं। BJP के 44 उम्मीदवार सीधे आगे बढ़ते हैं। शिवसेना के 22 उम्मीदवार भी ऐसा ही करते हैं। NCP के 2 उम्मीदवार भी मैदान साफ देखते हैं। इसके अलावा, मालेगांव में इस्लाम पार्टी का 1 उम्मीदवार अकेला खड़ा होता है। शुक्रवार को अंतिम नाम वापसी होती है। तब ये आंकड़े सामने आते हैं।

इसी बीच, विपक्ष तीखे आरोप लगाता है। कांग्रेस सवाल उठाती है। शिवसेना (UBT) चेतावनी देती है। NCP (SP) चिंता जताती है। वे कहते हैं कि सत्ता पक्ष दबाव डालता है। वे कहते हैं कि कार्यकर्ता डर महसूस करते हैं। वे कहते हैं कि कई प्रत्याशी मजबूरी में हटते हैं।

इसके बाद, राज्य चुनाव आयोग दखल देता है। आयोग जांच का आदेश देता है। आयोग रिटर्निंग अफसरों को रोक लगाता है। वह नतीजों का ऐलान टालता है। वह पहले सच्चाई चाहता है। फिर वह भरोसा बहाल करना चाहता है।

अब तस्वीर और जटिल बनती है। कई शहरों में साथी दल आमने-सामने आते हैं। फिर कुछ जगहों पर पुराने प्रतिद्वंद्वी साथ बैठते हैं। इसलिए, गठबंधन राजनीति बदलता चेहरा दिखाती है। दांव बड़ा हो जाता है।

कल्याण-डोंबिवली में 22 सीटें बिना मुकाबले चली जाती हैं। यह BJP प्रदेश अध्यक्ष रविंद्र चव्हाण का क्षेत्र है। वहीं, जलगांव में 12 सीटें ऐसी रहती हैं। यह जल संसाधन मंत्री गिरीश माहाजन का इलाका है। इसलिए, बहस तेज होती है।

KDMC में BJP के 15 उम्मीदवार सीधे आगे बढ़ते हैं। शिवसेना के 7 उम्मीदवार भी ऐसा करते हैं। पनवेल में 6 BJP उम्मीदवारों को कोई चुनौती नहीं मिलती। पुणे में मंजूषा नागपुरे और श्रीकांत जगताप भी सीधे मैदान पकड़ते हैं। फिर विपक्ष पीछे हट जाता है। नतीजों पर शक बढ़ता है।

उद्धव ठाकरे की शिवसेना (UBT) सतर्क रुख अपनाती है। नेता कुछ उम्मीदवारों को दूसरे जिलों में भेजते हैं। वे सुरक्षा सुनिश्चित करना चाहते हैं। वे कहते हैं कि सत्ता पक्ष हर तरीका अपनाता है। आदित्य ठाकरे खुलकर हमला बोलते हैं। वह कहते हैं, “पैसा राजनीति पर हावी होता है।” संजय राउत भी प्रशासनिक दबाव की बात करते हैं।

हालांकि, BJP जवाब देती है। पार्टी प्रवक्ता केशव उपाध्ये आरोप खारिज करते हैं। वह कहते हैं, विपक्ष हार समझ चुका है। वह रणनीति और लोकप्रियता का दावा करते हैं। वह कहते हैं कि आधुनिक व्यवस्था सब उजागर कर सकती है। इसलिए, आरोप राजनीति बन जाते हैं।

इसी दौरान, चुनाव आयोग तीन एजेंसियों से रिपोर्ट मांगता है। रिटर्निंग अफसर विवरण भेजते हैं। नगर आयुक्त और पुलिस आयुक्त भी तथ्य जोड़ते हैं। लक्ष्य साफ रहता है। आयोग सच्चाई खोजता है। वह दबाव और प्रलोभन की जांच करता है।

फिर भी, तुलना मुश्किल रहती है। पिछली बार सभी निगम साथ में मतदान नहीं कराते। इसलिए कोई पुराना संदर्भ नहीं मिलता।

अब राज्य मोड़ पर खड़ा रहता है। सत्ता पक्ष भरोसा दिखाता है। विपक्ष चुनौती देता है। आयोग जांच आगे बढ़ाता है। और आखिर में, मतदाता फैसला करते हैं।


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