कर्नाटक सर्वे में EVM पर भरोसा बढ़ा, लेकिन राजनीति तेज हुई
कर्नाटक नई बहस शुरू करता है। राज्य सरकार एक सर्वे जारी करती है। नतीजे स्पष्ट दिखते हैं। लोग EVM पर भरोसा जताते हैं। फिर राजनीति तुरंत गरम हो जाती है।
यह सर्वे लोकसभा चुनाव 2024 के बाद तैयार होता है। टीम चार संभागों में जाती है। बेंगलुरु, बेलगावी, कलबुर्गी और मैसूरु शामिल होते हैं। शोधकर्ता 5,100 लोगों से बातचीत करते हैं। वे कई सवाल पूछते हैं। लोग भरोसे, सटीकता और परिणामों पर राय देते हैं।
अब आंकड़े सामने आते हैं। 83 प्रतिशत से अधिक लोग कहते हैं कि EVM भरोसेमंद लगती है। लगभग 70 प्रतिशत लोग कहते हैं कि मशीन सही नतीजे देती है। कई लोग और मजबूत सहमति दर्ज करते हैं। कलबुर्गी क्षेत्र सबसे अधिक विश्वास दिखाता है। मैसूरु इसके बाद आता है। बेलगावी भी मजबूत भरोसा दिखाता है। बेंगलुरु सावधानी दिखाता है, लेकिन सहमति फिर भी अधिक रहती है।
इधर, राजनीतिक प्रतिक्रिया तेज होती है। राहुल गांधी लंबे समय से सवाल उठाते हैं। वे EVM पर शंका जताते हैं। वे चुनावी प्रक्रिया पर चिंता व्यक्त करते हैं। उनके बयान लगातार चर्चा में रहते हैं। लेकिन यह सर्वे अलग कहानी रखता है। यह मतदाताओं का नया रुझान दिखाता है।
फिर भाजपा मैदान में उतरती है। कर्नाटक में विपक्ष के नेता आर. अशोक सोशल मीडिया पर टिप्पणी करते हैं। वे कहते हैं कि लोग चुनाव प्रणाली पर भरोसा करते हैं। वे दावा करते हैं कि राहुल गांधी गलत संदेश फैलाते हैं। भाजपा इस सर्वे को कांग्रेस के लिए झटका बताती है। पार्टी कहती है कि लोग लोकतंत्र और मशीन दोनों पर यकीन रखते हैं।
इसके बाद एक और मुद्दा उठता है। कर्नाटक सरकार स्थानीय निकाय चुनावों में बैलेट पेपर की घोषणा करती है। भाजपा इस फैसले का विरोध करती है। पार्टी कहती है कि यह कदम पीछे ले जाता है। वह देरी, विवाद और गड़बड़ी की याद दिलाती है। भाजपा सवाल करती है कि जब जनता तकनीक पर भरोसा दिखाती है, तब सरकार पुराने सिस्टम की ओर क्यों मुड़ती है।
कांग्रेस अपनी दलील रखती है। पार्टी कहती है कि सवाल पूछना लोकतंत्र को मजबूत करता है। वह पारदर्शिता की मांग दोहराती है। वह अधिक जांच और ऑडिट पर जोर देती है। कांग्रेस कहती है कि भरोसा तब बढ़ता है, जब व्यवस्था खुलकर संवाद करती है।
इस बीच, विशेषज्ञ व्यापक तस्वीर दिखाते हैं। वे कहते हैं कि मतदाता अब तेज नतीजे चाहते हैं। वे कम विवाद चाहते हैं। वे तकनीक को भरोसे से जोड़ते हैं। इसलिए वे जागरूकता और प्रशिक्षण पर जोर देते हैं। वे सुझाव देते हैं कि चुनाव आयोग लगातार संवाद बढ़ाए।
अंत में, यह सर्वे एक संकेत देता है। कर्नाटक के मतदाता EVM पर भरोसा दिखाते हैं। राजनीति इस भरोसे को नई बहस में बदल देती है। अब सवाल यह रहता है: क्या यह भरोसा आगे भी बना रहेगा, या फिर नई राजनीति इसे बदल देगी?
