लोकसभा में ‘वन्दे मातरम्’ पर पीएम मोदी ने शुरू किया 150वीं वर्षगांठ पर बहस
नई दिल्ली – सर्दी सत्र के दूसरे सप्ताह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा में वन्दे मातरम् की 150वीं वर्षगांठ पर बहस शुरू की। यह बहस उस राजनीतिक विवाद के बीच हो रही है, जिसमें पीएम मोदी ने कांग्रेस पर 1937 में गीत की कुछ पंक्तियाँ हटाने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि इस बदलाव ने विभाजन के बीज बो दिए।
भाजपा नेतृत्व वाली एनडीए सरकार को लोकसभा बहस में तीन घंटे की हिस्सेदारी मिली। कुल दस घंटे के बहस सत्र में एनडीए के अलावा कांग्रेस के आठ नेता भी बोलेंगे। इनमें डिप्टी लोपी गोरव गोगोई, प्रियंका गांधी वाड्रा, दीपेन्द्र हुड्डा, बिमोल अकौइजाम, प्रणिति शिंदे, प्रशांत पडोले, चामला रेड्डी और ज्योत्सना महंत शामिल हैं।
प्रधानमंत्री मोदी ने दोपहर 12 बजे बहस शुरू की। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह भी इस बहस में हिस्सा लेंगे। प्रधानमंत्री के आरोपों पर कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने पलटवार किया। उन्होंने कहा कि वन्दे मातरम् से पंक्तियाँ हटाना कांग्रेस कार्य समिति का निर्णय था। समिति में महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, राजेंद्र प्रसाद और मौलाना अबुल कलाम आज़ाद जैसे नेता शामिल थे। जयराम रमेश ने कहा, “प्रधानमंत्री ने इस सीडब्ल्यूसी और रबिन्द्रनाथ टैगोर का अपमान किया। यह चौंकाने वाला है, लेकिन आश्चर्यजनक नहीं क्योंकि आरएसएस स्वतंत्रता संग्राम में शामिल नहीं था।”
लोकसभा बहस के बाद यह चर्चा मंगलवार को राज्यसभा में चलेगी। गृह मंत्री अमित शाह उच्च सदन में बहस की शुरुआत करेंगे।
वन्दे मातरम् पर बहस के अलावा कई मंत्रियों ने अपने मंत्रालयों से जुड़े महत्वपूर्ण दस्तावेज़ संसद में प्रस्तुत किए। इनमें संस्कृति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत, शिक्षा मंत्री जयंत चौधरी, वित्त मंत्री पंकज चौधरी, श्रम और रोजगार मंत्री शोभा करंदलाजे, पर्यावरण मंत्री किर्ति वर्धन सिंह और कॉर्पोरेट मामलों के मंत्री हर्ष मल्होत्रा शामिल हैं।
संसद में चल रही यह बहस न केवल गीत की ऐतिहासिक महत्ता पर केंद्रित है, बल्कि राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप और इतिहास की समीक्षा का भी हिस्सा बन गई है। बीजेपी और कांग्रेस नेताओं की ओर से तर्क और जवाबी तर्क संसद के सदस्यों और जनता के लिए चर्चा का मुख्य केंद्र बने हुए हैं।
इस बहस में सरकार और विपक्ष के बीच 150वीं वर्षगांठ को लेकर गहन चर्चा हो रही है। बहस के दौरान ऐतिहासिक संदर्भ, स्वतंत्रता संग्राम में योगदान देने वाले नेताओं की भूमिका और गीत की सांस्कृतिक एवं राजनीतिक प्रासंगिकता पर जोर दिया जा रहा है।
लोकसभा और राज्यसभा में इस बहस के परिणाम से आने वाले दिनों में राजनीतिक और सांस्कृतिक विमर्श को नया आयाम मिल सकता है।
