भारत इस सर्दी एक बार फिर प्रदूषण संकट में दाखिल हुआ। इस बार विवाद पराली जलाने के आँकड़ों पर छिड़ गया। कई वैज्ञानिक दावे सामने आए। इनसे सरकार के उस विश्वास पर सवाल खड़े हुए, जिसमें कहा गया कि पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने की घटनाएँ तेज़ी से घटी हैं।
सबसे पहले, इसरो के वैज्ञानिकों ने बड़ा खुलासा किया। उन्होंने कहा कि किसानों ने पराली जलाने का समय बदल दिया है। पहले किसान दोपहर के आसपास खेत जलाते थे। अब वे शाम 5 बजे के बाद आग लगाते हैं। इस बदलाव का एक उद्देश्य दिखता है—उपग्रहों से बचना।
इसके बाद, नासा के वैज्ञानिक हिरन जेठवा ने भी इसी ओर इशारा किया। उन्होंने कहा कि पराली की घटनाएँ कम दिख रही हैं, लेकिन हवा में उठता धुआँ कम नहीं हुआ। उन्होंने 15 साल के धुआँ-एरोसोल रिकॉर्ड का हवाला दिया और बताया कि 2025 तीसरा सबसे बदतर साल साबित हुआ।
अब इस बदलाव को समझने के लिए ज़मीन और आसमान की गतिविधियों को जोड़कर देखना होगा। जो उपग्रह भारत पर नज़र रखते हैं, वे दिन में सिर्फ दो बार स्कैन करते हैं। वे आमतौर पर दोपहर 1.30 बजे के आसपास क्षेत्र को कवर करते हैं। किसानों ने यह बात समझ ली है। इसलिए वे उस समय के बाद आग लगाते हैं।
इसरो के चार वैज्ञानिकों ने अपनी स्टडी में साफ लिखा कि 2020 में आग दोपहर 1.30 बजे चरम पर होती थी। 2024 में यह समय बदलकर शाम 5 बजे पहुँच गया। उन्होंने कहा कि किसान अब जानबूझकर उपग्रहों के स्कैनिंग समय के बाद आग जलाते हैं। इससे आग की गिनती कम दिखाई देती है, लेकिन वास्तविक घटनाएँ घटती नहीं हैं।
इसी बीच, नासा का GEO-KOMPSAT-2A जियोस्टेशनरी उपग्रह लगातार क्षेत्र को देखता रहता है। इस उपग्रह ने किसानों की नई रणनीति उजागर कर दी। डेटा ने साफ दिखाया कि देर शाम में आग बढ़ जाती है। इसलिए ISRO और NASA की स्टडी मिलकर यह बताती हैं कि आग की गिनती कम होना असल स्थिति नहीं दिखाती।
अब आते हैं सरकार के दावे पर। केंद्रीय पर्यावरण मंत्री ने संसद में कहा कि 2025 में पराली जलाने की घटनाएँ 90% घट गईं। सरकार की यह गिनती उन उपग्रहों पर आधारित है जो सिर्फ दो बार स्कैन करते हैं। यही वजह है कि सरकारी आँकड़े और वैज्ञानिक स्टडी एक-दूसरे के उलट दिखते हैं।
उधर, ज़मीनी जांच और भी स्पष्ट तस्वीर देती है। पंजाब के कई अधिकारियों ने माना कि किसान अब शाम 4 बजे के बाद आग लगाते हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि उपग्रह स्कैन कर चुके हैं। कई किसानों ने भी स्वीकार किया कि वे समय बदलकर ही पकड़े जाने से बचते हैं।
यह खुलासा दिल्ली-एनसीआर की हवा के लिए अहम है। हर साल नवंबर और दिसंबर में यह क्षेत्र ज़हरीली धुंध से घिर जाता है। पराली इसका एक हिस्सा है—हालाँकि अकेला कारण नहीं। वाहनों, उद्योगों और निर्माण गतिविधियों का प्रदूषण सालभर बना रहता है। पराली इसमें मौसमी जहर भर देती है।
अब बड़ी बात यह है कि हवा की सही समस्या तभी समझी जा सकती है जब डेटा सही हो। इसरो और नासा की स्टडी दिखाती हैं कि आधिकारिक आँकड़े असल स्थिति को नहीं दर्शाते। पराली जलाने के समय में बदलाव ने पूरी गणना को बदल दिया है।
इसलिए सरकार को ज़मीनी और वैज्ञानिक दोनों सूचनाएँ मिलानी होंगी। दिल्ली-एनसीआर की आबादी करोड़ों में है। हवा की हर गलती सीधे लोगों की सेहत पर असर डालती है। अगर किसानों ने समय बदलकर उपग्रहों को धोखा दिया है, तो समाधान भी उसी समझ से ही निकल सकता है।
अंततः हवा के संकट को हल करने के लिए सटीक डेटा, सही तकनीक और ईमानदार स्वीकारोक्ति ज़रूरी है। तभी इस चक्र को रोका जा सकता है।