ED की छापेमारी में बड़ा खुलासा, अल फलाह यूनिवर्सिटी दिल्ली ब्लास्ट कनेक्शन और फाइनेंशियल गड़बड़ियों की जांच के घेरे में
फरीदाबाद, हरियाणा – फरीदाबाद में भारी मात्रा में विस्फोटक मिलने और दिल्ली के लाल किले के पास हुए घातक धमाके के बाद अल फलाह यूनिवर्सिटी जांच के केंद्र में आ गई है। मैं शुरुआत फरीदाबाद की बरामदगी से करता हूँ क्योंकि इसी ने जांच का दायरा बढ़ाया। जांच एजेंसियों ने दोज़ गांव में डॉक्टर मुज़म्मिल शाक़िल के किराए के घर से विस्फोटक पाए। शाक़िल कश्मीर के रहने वाले हैं और अल फलाह में पढ़ाते थे। इसके तुरंत बाद दिल्ली में हुए कार ब्लास्ट में 10 से ज्यादा लोगों की मौत ने जांच को और तेज किया। एजेंसियों ने आरोपित सुसाइड बॉम्बर डॉक्टर उमर उन नबी का लिंक भी इसी यूनिवर्सिटी से जोड़ा। इसके बाद कई संदिग्धों को हिरासत में लिया गया।
इसके साथ ही जांच का फोकस यूनिवर्सिटी प्रशासन पर पहुंचा। एजेंसियों ने अल फलाह ग्रुप के चेयरमैन जव्वाद अहमद सिद्दीकी को तलब किया। उन्हें लगा कि सिद्दीकी की गवाही कई अनियमितताओं पर रोशनी डाल सकती है। इसी दौरान यूनिवर्सिटी पर आरोप लगा कि उसने NAAC मान्यता को लेकर धोखाधड़ी की और छात्रों तथा अभिभावकों को गुमराह किया।
मंगलवार को ईडी ने सिद्दीकी को मनी लॉन्ड्रिंग केस में गिरफ्तार कर लिया। ईडी ने कहा कि उसने अल फलाह ग्रुप के ठिकानों पर की गई तलाशी के दौरान मिले सबूतों की जांच के बाद यह कार्रवाई की। जांच उसी मामले के तहत चल रही है जिसमें दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने दो एफआईआर दर्ज की थीं। आरोप था कि यूनिवर्सिटी ने झूठे दावों से मान्यता दिखाकर अनुचित आर्थिक लाभ उठाया।
ईडी अधिकारियों ने कहा कि ट्रस्ट ने करोड़ों रुपये ऐसे कंपनियों में भेजे जो परिवार के सदस्यों से जुड़ी हैं। एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि ट्रस्ट 1995 में बना और सिद्दीकी ने 1990 के दशक के अंत से पूरे नेटवर्क पर पूरा नियंत्रण रखा। उन्होंने कहा कि यूनिवर्सिटी का विस्तार तेज़ी से हुआ लेकिन उसकी वित्तीय स्थिति यह वृद्धि साबित नहीं करती। कई लेन-देन संदिग्ध कंपनियों के जरिए किए गए।
तलाशी के दौरान ईडी ने 48 लाख रुपये नकद, डिजिटल डिवाइस और कई वित्तीय दस्तावेज जब्त किए। अधिकारियों ने कहा कि निर्माण, कैटरिंग और सर्विस कॉन्ट्रैक्ट उन कंपनियों को दिए गए जो सिद्दीकी की पत्नी और बच्चों से जुड़ी थीं। नौ कंपनियाँ एक ही पते पर रजिस्टर्ड मिलीं। अधिकारियों ने कहा कि इनमें शेल कंपनियों जैसी सभी आशंकाएँ दिखीं— कम गतिविधि, साझा ईमेल आईडी, एक जैसे डायरेक्टर और शून्य उपयोगिता बिल।
जांच में पता चला कि सैलरी रिकॉर्ड बेहद कमजोर था। एचआर या पेरोल से जुड़े दस्तावेज़ नहीं मिले। ईपीएफओ और ईएसआईसी में जमा होने वाले कानूनी कागज़ात भी गायब थे। इससे एजेंसियों को शक हुआ कि कई कर्मचारियों का अस्तित्व कागज़ों पर ही था।
अब जांच दो मोर्चों पर बढ़ रही है— एक तरफ फाइनेंशियल अनियमितताएँ और दूसरी तरफ blast में शामिल संदिग्धों से यूनिवर्सिटी के रिश्ते। एजेंसियाँ यह स्पष्ट करने में जुटी हैं कि इन कड़ियों की गहराई कितनी है और क्या इसका नेटवर्क पहले से कहीं बड़ा था।
