74 की उम्र, पर पकड़ मजबूत: क्यों नीतीश कुमार अब भी बिहार की राजनीति के केंद्र में हैं
पटना – बिहार में वोटों की गिनती से ठीक एक दिन पहले गुरुवार को पूरे राज्य में पोस्टर लगे। उन पर लिखा था— “टाइगर अभी जिंदा है”। इन पोस्टरों में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की तस्वीर थी। कई लोगों ने उन्हें पहले ही कमजोर मान लिया था। उनके स्वास्थ्य को लेकर सवाल उठते रहे। लेकिन रुझानों ने दिखा दिया कि 74 की उम्र में भी वह चुनावी मैदान में उतनी ही मजबूती से डटे हैं।
रुझानों के अनुसार, जेडीयू 101 सीटों में से 75 से अधिक पर बढ़त बनाए हुए है। इससे एनडीए को सत्ता में वापसी की मजबूत उम्मीद मिली है। अगर ये रुझान नतीजों में बदलते हैं, तो यह जेडीयू के लिए बड़ा पलटवार होगा। लगभग 20 साल की सत्ता-थकान के बावजूद पार्टी ने 2020 की तुलना में 30 सीटें बढ़ाई हैं और लगभग 88% सीटें बचाए रखी हैं।
एनडीए के भीतर ‘बड़े भाई’ की जंग
बिहार की बड़ी लड़ाई एनडीए बनाम महागठबंधन की है, लेकिन इसके भीतर एक दूसरी टक्कर भी चल रही है— बीजेपी और जेडीयू में किसकी बड़ी भूमिका?
2020 में पहली बार बीजेपी जेडीयू से आगे निकल गई थी। तब जेडीयू ने 115 सीटें लड़ी थीं और 43 जीती थीं। वहीं बीजेपी ने 110 सीटों में से 74 जीती थीं। इस बार, हालांकि सीटें बराबर बंटी, लेकिन जेडीयू ने दिखा दिया कि वह अब भी मजबूत खड़ी है। अंतिम नतीजे तय करेंगे कि गठबंधन में “बड़े भाई” की कुर्सी किसके पास जाएगी।
नीतीश कुमार का कायम आकर्षण
यह चुनाव बिहार की राजनीति के लिए खास है। माना जा रहा है कि यह नीतीश कुमार का आखिरी चुनाव हो सकता है। वह लगभग 19 साल से मुख्यमंत्री हैं और जीतने पर यह उनका 10वां कार्यकाल होगा।
विशेषज्ञों का कहना है कि नीतीश की ताकत तीन कारणों से आती है—
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जातीय संतुलन की सटीक समझ
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महिला मतदाताओं का मजबूत समर्थन
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उनकी साफ-सुथरी और विकासवादी छवि
महिलाओं का वोट इस चुनाव में निर्णायक साबित हुआ। महिलाओं का मतदान प्रतिशत पुरुषों से 10% ज्यादा रहा— 74.03% बनाम 64.1%। उनकी हाल की योजना, जिसमें उन्होंने महिलाओं के खातों में ₹10,000 भेजे, ने इस आधार को और मजबूत बना दिया।
‘सुशासन बाबू’ की यात्रा
नीतीश कुमार ने 2005 में एक बदहाल बिहार संभाला था। कानून-व्यवस्था की खराब छवि और “जंगल राज” के आरोपों से घिरे राज्य में उन्होंने विकास और सुधार के जरिए अपनी छवि बनाई— ‘सुशासन बाबू’।
पिछले वर्षों में राजनीतिक पैंतरेबाज़ी और गठजोड़ बदलने के कारण उन्हें ‘पलटू राम’ भी कहा गया। लेकिन बिहार की राजनीति में उनका प्रभाव आज भी उतना ही गहरा है।
रुझान साफ कहते हैं कि नीतीश कुमार की पकड़ अब भी मजबूत है। 74 की
