कैंट सीट : राम मंदिर आंदोलन के बाद से 2017 तक खिलता रहा कमल

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पांच साल के सूखे को खत्म करने में जुटी भाजपा
– मोदी लहर में स्थानीय कारणों के चलते भाजपा को मिली थी हार
कानपुर, 02 जनवरी (हि.स.)। औद्योगिक नगरी कानपुर में राम मंदिर के आंदोलन से भाजपा को बड़ी जीत हासिल हुई थी। इनमें से कैंट (छावनी) सीट ऐसी रही जहां पर 1991 से बराबर कमल खिलता रहा, लेकिन 2017 में स्थानीय कारणों के चलते पार्टी को हार का सामना करना पड़ा। इस हार को पार्टी के दिग्गज नेता पचा नहीं पा रहे हैं और पांच साल के सूखे को खत्म करने के लिए नई-नई रणनीति पर काम हो रहा है। इन पांच सालों में जीत के बाद भी कांग्रेस विधायक सुहैल अंसारी से अधिक चर्चा में रहने के लिए पूर्व विधायक रघुनंदन भदौरिया प्रयास करते रहे।
कानपुर में भाजपा को सबसे पहले गोविन्द नगर सीट पर 1989 में जीत हासिल हुई थी। इसके दो साल बाद राम मंदिर का आंदोलन जनता के बीच सिर चढ़कर बोला और कैंट तत्कालीन छावनी सीट, कल्याणपुर, गोविन्द नगर, जनरलगंज और सीसामऊ सीट पर भाजपा का कब्जा हो गया। यहां पर भाजपा की इतनी अच्छी पैठ बनी कि प्रदेश में सत्ता न रहते हुए भी पार्टी जीतती रही। इनमें से एक सीट कैंट की रही जहां, पर 1991 से लेकर 2017 तक भाजपा का कब्जा रहा। पहले पांच बार वर्तमान उत्तर प्रदेश सरकार के कैबिनेट मंत्री सतीश महाना चुनाव जीतते रहे। इसके बाद 2012 में सतीश महाना महाराजपुर सीट से चुनाव लड़कर जीते तो इस सीट पर रघुनंदन सिंह भदौरिया जीतने में सफल रहे। इसके बाद 2017 में जब प्रदेश में मोदी लहर थी और भाजपा तीन सौ से अधिक सीट जीतने में सफल रही तो रघुनंदन भदौरिया स्थानीय कारणों के चलते चुनाव हार गये। इस सीट पर कांग्रेस के सुहैल अंसारी जीतने में सफल रहे, हालांकि उनका गठबंधन सपा के साथ था और बसपा से कोई दमदार उम्मीदवार नहीं था।
सूखे को खत्म करने में जुटी भाजपा
पांच साल से कैंट सीट से कांग्रेस का विधायक जरुर है, लेकिन पूर्व विधायक रघुनंदन सिंह भदौरिया अधिक चर्चा में रहने का प्रयास करते रहे। इस सीट पर पिछले विधानसभा चुनाव में हार को पार्टी के नेता पचा नहीं पा रहे हैं। पार्टी का प्रयास है कि इस सीट पर हर हाल में जीत होना चाहिये। इसको लेकर राज्य सभा सांसद बृजलाल को प्रभारी बनाया गया है। पार्टी का मानना है कि अगर दलित मतदाताओं को अपने पाले में किया जा सका तो जीत सुनिश्चित है और इसके चलते बृजलाल को जिम्मेदारी सौंपी गई है। हालांकि 2012 के परिसीमन के बाद मतदाताओं के लिहाज से सबसे अधिक मतदाता मुस्लिम हैं, लेकिन पार्टी को भरोसा है कि सपा, कांग्रेस और बसपा से उम्मीदवार मुस्लिम ही आएंगे। इससे मुस्लिम मतदाताओं में बिखराव होना स्वाभाविक है और पार्टी की जीत हो सकती है। वहीं पूर्व विधायक रघुनंदन सिंह भदौरिया को विश्वास है कि एक बार फिर पार्टी टिकट देगी और इसको लेकर वह पांच साल से इस सीट पर चर्चा के केन्द्र में रहने का प्रयास करते रहे।
पांच बार विधायक बने सतीश महाना
कैंट सीट जिसे पहले छावनी सीट के नाम से जाना जाता था और 2012 में परिसीमन के बाद इसे कैंट सीट नाम दिया गया। परिसीमन में इस सीट का बड़ा क्षेत्र महाराजपुर विधानसभा सीट पर चला गया। इसके चलते सतीश महाना 2012 में महाराजपुर सीट से चुनाव लड़कर विधायक चुने गये और 2017 में भी विधायक बनकर उत्तर प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री बने। इसके पहले पहली बार 1991 में सतीश महाना छावनी सीट से विधायक बने और लगातार पांच बार इस सीट का प्रतिनिधित्व किये।
50 फीसदी हैं मुस्लिम मतदाता
कानपुर कैंट विधानसभा में 3,47,988 मतदाता हैं। इसमें मुस्लिम आबादी करीब 50 प्रतिशत है। जबकि सामान्य 17 प्रतिशत, दलित 20 प्रतिशत और अन्य जातियां करीब 13 प्रतिशत है।
एक नजर में विधान सभा सीट
-1977 में जनता पार्टी के बाबूराम शुक्ला ने जीत दर्ज की
-1980 में कांग्रेस के बहादुर नारायण मिश्र को विजय मिली
-1985 में कांग्रेस के पशुपति नाथ ने परचम लहराया
-1989 में जनता दल के गणेश दीक्षित जीते
-1991 में भाजपा के सतीश महाना ने जीत दर्ज की
-1993 में भाजपा के सतीश महाना विजयी रहे
-1996 में भाजपा के सतीश महाना जीते
-2002 में भाजपा के सतीश महाना काे जीत मिली
-2007 में भाजपा के सतीश महाना जीते
-2012 में भाजपा के रघुनंदन सिंह भदौरिया विजयी हुए
-2017 में कांग्रेस के सोहिल अख्तर अंसारी जीते


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