केला के थम्ब से तैयार किया बिजली नौवीं कक्षा के छात्र कुशाग्र और जयंत ने , जलाया बल्ब

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बेगूसराय, 31 जनवरी (हि.स.)। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की जन्मभूमि और बिहार केसरी डॉ. श्रीकृष्ण सिंह की कर्मभूमि बेगूसराय के बच्चों ने एक नया अविष्कार कर बड़ों-बड़ों को सोचने को मजबूर कर दिया। यहां के नौवीं कक्षा के छात्रों ने केला के थम्ब (तना) से बिजली तैयार कर पर्यावरण अनुकूलता की दिशा में एक अद्वितीय उदाहरण प्रस्तुत किया है। सरकार अगर इनके बनाए गए प्रोजेक्ट पर गंभीरतापूर्वक काम करे तो बहुत ही कम लागत में पर्यावरण अनुकूल बिजली बनाई जा सकती है।

माउंट लिट्रा पब्लिक स्कूल उलाव के नौवीं कक्षा के छात्र कुशाग्र कुमार और जयंत कुमार ने केला के तना से बिजली बनाने का मॉडल तैयार किया और नाम दिया है ‘बनाना बायो बैटरी’।

कुशाग्र एवं जयंत ने बताया कि हम ना केवल किताबी ज्ञान प्राप्त करते हैं, बल्कि किताब ज्ञान के साथ-साथ हमेशा कुछ अलग करने की दिशा में सोचते हैं। इसी दौरान जिला स्तरीय गणित, विज्ञान और पर्यावरण प्रदर्शनी की तैयारी शुरू की गई तो इसके मुख्य विषयों में से एक पर्यावरण अनुकूल सामग्री विषय पर हमने अध्ययन करना शुरू किया। अध्ययन की कड़ी में जब परियोजना के लिए विभिन्न ग्रामीण क्षेत्रों का भ्रमण किया शुरू किया तो बहुतायत संख्या में केला की खेती देखकर इसी पर हमने रिसर्च किया। केला के तना से मामूली खर्च पर बिजली बनाई जा सकती है। हमने इस प्रोजेक्ट पर काम शुरू कर काम शुरू किया तो सफलता मिली।
कुशाग्र एवं जयंत ने बताया कि पहले हम लोगों ने केले के तने को चार समान टुकड़ों में काटा और उस पर पानी डालकर सात दिन तक सड़ने के लिए छोड़ दिया। उसके बाद इसमें कॉपर और जिंक का दो इलेक्ट्रोड लगाया। लकड़ी का चार खाने का बॉक्स बनाया और एक-एक खाने में केले के कटे हुए तने को रख दिया और उसे श्रृंखलाबद्ध आपस में जोड़कर स्विच और बल्ब से जोड़ दिया। जब हम लोगों ने मल्टीमीटर से चेक किया तो प्रत्येक तने से 1.2 वोल्ट विद्युत उत्पन्न हो रहा था। जिसका मुख्य कारण है कि केले के तने में सिट्रिक अम्ल रहता है। जैसे-जैसे तना सड़ता जाएगा, उसमें सिट्रिक अम्ल की मात्रा बढ़ती जाएगी। इस तरह इसके प्रयोग से बिजली का उत्पादन किया जा सकता है। खासकर वैसे किसान जो केले की खेती बहुतायत मात्रा और क्षेत्र में करते हैं, वह चाहें तो इस परियोजना को लघु व्यवसाय का रूप दे सकते हैं, जिसमें उनकी लागत मूल्य नहीं के बराबर होगी।
बच्चों ने कहा कि हमारा प्रयोग शत-प्रतिशत सफल रहा। सरकार, वैज्ञानिक और रिसर्च करने वाले अगर इस पर ध्यान दें तो केला के खेती के सहारे जहां फसल से किसान आत्मनिर्भर बनेंगे। वहीं, उसके बेकार तना के सहारे हमारा देश ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बन सकता है। केला का फल कट जाने के बाद तना बेकार हो जाता है। लेकिन हमारे इस परियोजना में उसका भी उपयोग होगा और बेकार होने वाली चीजों से पूरी तरह से पर्यावरण अनुकूल बिजली उत्पादन होगा। इस संबंध में विद्यालय के निदेशक डॉ. मनीष देवा और प्राचार्य शीतल देवा ने बताया कि कुशाग्र एवं जयंत ने मिलकर केले के तने से बिजली उत्पन्न कर वर्किंग मॉडल तैयार किया है। दोनों ने पर्यावरण अनुकूल प्रोजेक्ट से वैज्ञानिक प्रतिभा का अनमोल परिचय दिया है। बिहार के बेगूसराय, भागलपुर, हाजीपुर आदि जिलों में सैकड़ों हजारों एकड़ में केला की खेती होती है, यहां इस परियोजना पर काम हो तो एक नई क्रांति हो सकती है।

 


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