खरना के साथ ही छठ व्रतियों का 36 घंटे का निर्जला उपवास शुरू

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लॉकडाउन के बीच किया जा रहा चार दिवसीय महापर्व चैती छठ     अस्ताचलगामी सूर्य को पहला अर्ध्य 30 मार्च को और उदीयमान को दूसरा 31 को



पटना, 29 मार्च (हि.स.)। रविवार की शाम खरना पूजा के साथ ही छठ व्रतियों का 36 घंटे का निर्जला उपवास शुरू हो गया। शनिवार को नहाय खाय के साथ शुरू लोकआस्था का महापर्व चैती छठ के दूसरे दिन रविवार को खरना पूजा की गई। आज व्रतियों ने सुबह से निर्जला उपवास रखा और शाम में  पूजा कर दूध, चावल-गुड़ की खीर, केला, रोटी या पूड़ी का प्रसाद ग्रहण किया। व्रती 30 मार्च की शाम को अस्ताचलगामी और मंगलवार को उदीयमान सूर्य को अर्घ्य देंगे। इसके साथ चैती छठ  संपन्न हो जाएगा। चार दिनों के इस अनुष्ठान में सफाई और पवित्रता का विशेष ख्याल रखा जाता है।

छठ पर्व का पौराणिक महत्व

साल में दो बार छठ  किया जाता है। पहल छठ  चैत्र और दूसरा कार्तिक महीने में  होता  है। चैत्र माह की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को नहाय खाय होता है। इस दिन से ही छठ  की शुरुआत होती है। किवदंतियों के अनुसार, छठी मैया सूर्य देव की बहन हैं। इसलिए जो व्यक्ति छठ पूजा में सूर्य देव की आराधना करते हैं, उनकी सभी मनोकामनाएं छठी मैया पूर्ण करती हैं। साथ में घर में धन-धान्य का आगमन होता है और सभी स्वस्थ रहते हैं। पौराणिक मान्यता के अनुसार छठी मैया या षष्ठी माता संतानों की रक्षा करती हैं और उन्हें दीर्घायु प्रदान करती हैं। शास्त्रों में षष्ठी देवी को ब्रह्मा जी की मानस पुत्री भी कहा गया है। पुराणों में इन्हें मां कात्यायनी भी कहा गया है, जिनकी पूजा नवरात्रि में षष्ठी तिथि पर होती है। षष्ठी देवी को ही बिहार-झारखंड में छठ मैया कहा गया है।

लॉकडाउन का दिख रहा असर

छठ पर्व पर लोग एक साथ मिलकर नदियों या तालाबों के पास एकत्र होते हैं, लेकिन इस बार लॉकडाउन की वजह से लोगों ने घरों से ही अनुष्ठान किया। नदी या तालाबों में अर्घ्य देने नहीं गये।

सनातन संस्कृति में सूर्य आराधना का विशेष महत्व

सनातन संस्कृति में सूर्य आराधना का विशेष महत्व है। नवग्रहों में सूर्य देव को राजा का पद दिया गया है। इसका मतलब यह है कि वह सृष्टि के पालनहार हैं और पूरे ब्रहमांड का ख्याल रखते हैं। सूर्य अपनी रश्मियों से धरती पर प्रकाश बिखेरते हैं और सूर्य के इसी प्रकाश की वजह से पृथ्वीलोक पर जीवन संभव हुआ है। इसलिए सूर्यदेव को जीवनदाता माना जाता है। इसलिए सूर्यदेव का आभार जताने और उनसे आशीर्वाद लेने के लिए साल में दो बाकर छठ का पर्व बहुत ही धूमधाम और पवित्रता के साथ मनाया जाता है। समें बड़ी संख्या में व्रती नदी, तालाब और पवित्र जल सरोवरों के तट पर इकट्ठे होते हैं और सूर्य को अर्घ्य देते हैं। चार दिनों तक चलने वाले इस पर्व को छठ पूजा, छठ, डाला छठ, छठी माई पूजा, सूर्य षष्ठी के नामों से जाना जाता है।

 


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