छिड़ी बहस : ममता की रैली से किसे नफा, किसे नुकसान, फिर अस्तित्व संकट से गुजरेगी कांग्रेस

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कोलकाता, 20 जनवरी (हि.स.)। एक दिन पहले ही कोलकाता के सबसे बड़े ब्रिगेड परेड मैदान में पार्टी सुप्रीमो ममता बनर्जी के आह्वान पर देश भर की 22 विपक्षी पार्टियों की महारैली हुई। ममता के मंच पर कांग्रेस, सपा, बसपा, डीएमके, एनसीपी समेत देशभर की कई बड़ी विपक्षी पार्टियों के प्रतिनिधि उपस्थित थे। सभी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के खिलाफ लामबंदी की प्रतिज्ञा की है। सोशल साइट पर दावा किया जा रहा है कि इस रैली में करीब 10 लाख लोग उमड़े थे लेकिन इसके साथ ही यह भी चर्चा छिड़ गई है कि ममता की इस महारैली से किसे नफा हुआ और किसे नुकसान। भाजपा और तृणमूल को हुए नफा-नुकसान के बारे में तो चर्चा चल ही रही है। सोशल साइट पर सबसे अधिक चर्चा में कांग्रेस है। अधिकतर लोग इस बात का दावा कर रहे हैं कि इस रैली से भले ही किसी को कुछ मिला या नहीं मिला पर कांग्रेस को नुकसान जरूर हुआ है। दरअसल, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सोमेन मित्रा ने पहले से ही घोषणा की है कि पश्चिम बंगाल में लोकसभा का चुनाव अकेले लड़ेगी। राहुल गांधी ने प्रदेश कांग्रेस के प्रस्ताव पर सहमति दी है। 2019 के लोकसभा चुनाव में अकेले अपने दम पर चुनाव लड़ने का दावा करने वाले प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दावा करते हैं कि प्रदेश में उनकी लड़ाई तृणमूल सुप्रीमो ममता बनर्जी से है। इसके बाद भी ममता के मंच पर कांग्रेस के प्रतिनिधि के तौर पर संसद में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे पहुंचे और उन्होंने यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी के संदेश को भी पढ़ा है। सोनिया ने कहा था कि वर्तमान में देश अस्थिर दौर से गुजर रहा है और इससे उबरने के लिए ममता ने जो कोशिशें शुरू की है वह वाकई में सराहनीय है। राहुल गांधी ने भी चिट्ठी लिखकर ममता की कोशिशों को नैतिक समर्थन दिया था और खड़गे ने भी कहा था कि समग्र विपक्ष का यह रवैया रहना चाहिए कि लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा के उम्मीदवार के सामने महागठबंधन का केवल एक उम्मीदवार खड़ा हो। इसके बाद यह सवालों के घेरे में आ गया है कि लोकसभा चुनाव के दौरान प्रदेश में कांग्रेस का क्या रोल रहेगा? सवाल यह है कि लोकसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस तृणमूल प्रत्याशी के खिलाफ अपना उम्मीदवार खड़ा करेगी या नहीं और अगर खड़ा करेगी तो जनता उन्हें किस विश्वास से वोट देगी, क्योंकि सोनिया गांधी और कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने ममता बनर्जी की कोशिशों को सराहा है और इस बात पर सहमति बनी है कि भाजपा के खिलाफ संयुक्त विपक्षी उम्मीदवार खड़ा होना चाहिए। इसके बाद यह साफ हो चला है कि इस महारैली की वजह से अगर किसी को सबसे ज्यादा नुकसान होने वाला है तो कांग्रेस को पश्चिम बंगाल में होने वाला है। इसके अलावा जिस बड़े तरीके से ममता के मंच पर शामिल हुए देशभर के दिग्गज नेताओं ने ममता बनर्जी का समर्थन किया है उससे यह साफ हो चला है कि इसका लाभ लोकसभा चुनाव के दौरान निश्चित तौर पर ममता को प्रदेश में होने वाला है लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का दावा है कि भाजपा को भी इसका नुकसान होने वाला नहीं है। क्योंकि ममता के मंच पर ऐसे नेता जुटे थे जो कायदे से या तो भ्रष्टाचार में घिरे हैं या अपने राजनीतिक स्वार्थ में एकत्रित हुए थे। लोगों के बीच यह संदेश भी जा रहा है कि एकमात्र नरेंद्र मोदी को हराने के लिए ये सारे लोग एक हो गए हैं जो कभी ना कभी भ्रष्टाचार में लिप्त रहे। उस पर से इन सभी पार्टियों को कांग्रेस का भी समर्थन किया जाना लोगों के मन में संदेह पैदा कर रहा है। ऐसे में यह भी दावा किया जा रहा है कि लोकसभा चुनाव के दौरान भारतीय जनता पार्टी को इसका नुकसान के बजाय फायदा ही मिलने वाला है। कुल मिलाकर कहा जाए तो ममता की महारैली से पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ़ पार्टी तृणमूल कांग्रेस को तो लाभ होगा ही, भाजपा को भी लाभ मिलने वाला है और अगर सबसे अधिक नुकसान किसी को होना है तो वह कांग्रेस को होगा। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाजवादी पार्टी ने एक होकर कांग्रेस को पहले ही किनारे लगाया है। पश्चिम बंगाल में ममता के महागठबंधन ने कांग्रेस को इसी अंदाज में किनारा किया है और अधिकतर क्षेत्रों में कांग्रेस गठबंधन में सरकार बनाने के लिए मजबूर हुई है। पश्चिम बंगाल में सारदा, नारदा, रोजवैली जैसे चिटफंड मामले में फंसे तृणमूल के कई नेता भी ममता के मंच पर उपस्थित थे जिसे लेकर कांग्रेस अमूमन सवाल खड़ा करती रही है। प्रदेश कांग्रेस के नेताओं ने चिटफंड मामले को लेकर तृणमूल को पहले भी घेरा है और उन्हीं नेताओं के साथ शनिवार को कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व अभिषेक मनु सिंघवी और मलिकार्जुन खड़गे ने मंच साझा किया है। भाजपा समर्थक और नेता सोशल साइट पर इस मामले को भी भुना रहे हैं। तो अब देखने वाली बात होगी कि लोकसभा चुनाव के दौरान ममता का यह महागठबंधन क्या रंग लाता है।


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