बस्तर में पारम्परिक लोकपर्व छेरछेरा की धूम

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जगदलपुर, 13 जनवरी (हि.स.)। जगदलपुर सहित सम्पूर्ण बस्तर में प्रतिवर्ष पौष पूर्णिमा का उत्सव ‘‘छेरछेरा’’ उल्लास के साथ मनाया जाता है। यह पर्व छेरछेरा पुन्नी के नाम से प्रसिद्ध है जो पुन्नी के दस दिन पहले ही शुरु हो जाती है। इन दिनों गांवों के गलियों से लेकर शहर तक महिलाओं व पुरुषों की टोलियां प्रसन्नता पूर्वक नाचतते गाते नि:संकोच मांगते दिखाई दे रहे हैं। इन दिनों जगदलपुर शहर में भी छेरछेरा पर्व के उत्सव में जहां स्थानीय टोलियां देखी जा रही हैं वहीं ग्रामीण अंचलों के नर्तक दल छेरछेरा के अवसर पर नगर में दिन भर नाचते देखे जा रहे हैं।
बस्तर में वर्षभर पर्व उत्सव मनाते हैं। शायद ही कोई माह किसी पर्व या उत्सव के बिना रहता है। कभी देवी-देवता का त्योहार होता है, तो कभी अन्न धरती का, कभी वर्षा की आंकक्षा से त्योहार मनाते हैं तो कभी अच्छी फसल होने की खुशी में, कभी नयी फसल की खुशी मनाई जाती है तो कभी कंद-मूल, फल खाने का उत्सव मनाया जाता है। साल भर किसी न किसी पर्व और उत्सव में संलग्न रहते हैं। सभी पर्व, त्योहार मनाने का ढंग लगभग एक जैसा होता है। सिर्फ समर्पण और आस्था के कारण अलग-अलग होते हैं, सभी त्योहारों के केेंद्र में खाना-पीना और हंसी खुशी होती है। सभी त्योहार में नृत्य और गीत का आयोजन होता है कभी व्यक्तिगत स्तर पर तो कभी सामूहिक स्तर पर ऐसे सभी आयोजनों के केंद्र में उनके इष्ट देवी-देवता होते हैं।
रंगकर्मी, लोककला एवं संस्कृति के जानकार रूद्रनारायण पाणिग्राही ने बताया कि छेरछेरा उत्सव को फसल की उपलब्धि के आनंद का प्रतीक कहें तो गलत न होगा। छेरका नामक यह उत्सव बस्तर की परजा तथा माड़िया नामक जनजातियों को छोड़कर सम्पूर्ण आदिवासियों के द्वारा पूरे बस्तर में पौष महीने में अत्यंत धूमधाम से मनाया जाता है। यह उत्सव पौष पूर्णिमा के एक सप्ताह पूर्व प्रारंभ होकर पूर्णिमा को समाप्त होता है। इस उत्सव में महिला-पुरूष, युवक-युवतियों के साथ-साथ छोटे बच्चे भी बढ़-चढ़कर भाग लेते हैं, अधिकतर छोटे बच्चों में उत्साव देखते बनता है। गांव-पारा की टोलियां घर-घर जाकर गीतों भरा नृत्य करते हैं तथा गृहस्वामी पुरस्कार स्वरूप में इन्हें धान, चांवल, पैसे आदि देता है।
छेरछेरा की समाप्ति पर युवक-युवतियों की टोलियां गांव के किनारे, नदी-नाले अथवा गांव से बाहर एकत्र होकर मिलजुलकर खाते हैं। उत्सव से संचित रूपयों से भोजन हेतु आवश्यक सामग्री बकरे-मुर्गियां इत्यादि खरीद कर पिकनिक की तरह मनाते हैं। इस दिन एक ओर कुछ लोग भोजन पकाने में जुट जाते हैं बाकी हंसी-ठिठौली और खेलकूद का आनंद लेते शाम ढले अपने घरों को लौट जाते हैं।
वरिष्ठ पत्रकार राकेश पांडे के अनुसार छेरका नृत्य में टोली अपने समूह के साथी का चुनाव ‘नकटा’ के रूप में करते हैं। नकटा की रूप सज्जा विदूषक जैसी होती है। नव युवतियों के बीच भी एक ‘नकटी’ होती है। दोनों ही अपने मुंह में मुखौटा रखकर नाचते हैं। इनके साथ समुदाय के सदस्य गीत गाते हैं। विभिन्न बिम्बो प्रतिकों का उपयोग किया जाता है। नकटा बने हुए युवक को कुछ गांवों में लंगोटी पहनाकर राख लगाकर उसका रूप कुछ साधू सा बना दिया जाता है। छेरका में विविध प्रकार के मुखौटों का प्रयोग होता है। यदि मुखौटा उपलब्ध नहीं होता ह तो उस स्थिति में नकटा अपने दोनों हाथों को अपने मुंह के सामने रखकर हुय-हुय की आवाज निकालता है। वहीं दूसरी ओर युवतियों द्वारा मिट्टी की पुतली बनाकर उसे आभूषण तथा वस्त्र पहनाती है। इस पुत्तलिका को टोकरे में रखकर तारा गीत गाती है। 


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