गौरक्षकों की हिंसा पर फैसला सुरक्षित

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नई दिल्ली, 03 जुलाई (हि.स.)। गौरक्षकों की हिंसा पर लगाम लगाने के मामले पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने आज फैसला सुरक्षित रख लिया है। सुनवाई के दौरान गौरक्षा के नाम पर हिंसा करने के मामले पर कोर्ट ने सख्ती दिखाते हुए कहा कि कोई भी कानून को हाथ में नहीं ले सकता। इस तरह के मामलों पर रोक लगाना राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है। ये कोर्ट की भी ज़िम्मेदारी बनती है। हम इस पर विस्तृत फैसला देंगे। सुनवाई के दौरान देश के कई इलाकों में बच्चा चोरी के शक में लोगों की हत्या का मसला भी उठाया गया लेकिन कोर्ट ने इस पर कोई टिप्पणी नहीं की।

6 सितंबर 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि लोगों को कानून अपने हाथ में नहीं लेना चाहिए। इसके लिए एक प्रक्रिया होनी चाहिए। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने कहा था कि विजिलेंटिज्म बढ़ना नहीं चाहिए और इसके खिलाफ कोई कार्रवाई होनी चाहिए। उन्होंने कहा था कि राज्य सरकारें ये देखेंगी कि ऐसी घटनाएं न हों। राज्य सरकारें एक सीनियर पुलिस अधिकारी को ऐसी शिकायतों की देखरेख के लिए नियुक्त करें।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की वकील इंदिरा जय सिंह ने कहा था कि गौरक्षकों के खिलाफ कार्रवाई के लिए केंद्र सरकार केवल बयान देती है। इसके लिए कड़े दिशा-निर्देश देने की जरूरत है। ये पूरे देश का मसला है। उसके पहले सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने कहा था कि वो किसी भी तरह के निजी विजिलेंस का समर्थन नहीं करता है।

केंद्र की ओर से सालिसिटर जनरल रंजीत कुमार ने कहा था कि ये राज्य का मसला है| इससे केंद्र का कोई लेना-देना नहीं है। सुनवाई के दौरान गुजरात सरकार ने कहा था कि उना की घटना में पर्याप्त कदम उठाए गए हैं। कांग्रेस नेता तहसीन पूनावाला ने याचिका दायर कर मांग की है कि गोरक्षा दलों पर बैन लगाया जाए। याचिका में कहा गया है कि गुजरात, कर्नाटक और महाराष्ट्र सरकार ने गोरक्षकों को ट्रकों की चेकिंग के अघोषित लाइसेंस दे रखे हैं। इन गोरक्षकों को दिया गया लाइसेंस रद्द किया जाए। याचिका में देशभर में गोरक्षा के नाम पर हिंसा फैलानेवालों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की गई है। कोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार और छह राज्य सरकारों को नोटिस जारी किया था।


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