कुटुमसर गुफा के भीतर बनी है चूना पत्थर से सुंदर आकृतियां : इस गुफा के अन्दर चूना पत्थर से बनी स्टेक्टेलाइट व स्टेलेग्माईट आकृतियां बनी हैं । इस गुफा में गहरा अंधेरा रहता है। जैसे ही इन आकृतियों पर सूरज की किरणें पड़ती हैं तो ये सारी आकृतियां झूम उठती है। यहां की चूना पत्थर से बनी विभिन्न आकृतियां लोगों का मन मोह लेती है। इन आकृतियों में आप जितनी चाहे उतनी आकृतियां ढूंढ सकते हैं। इस गुफा की सबसे खास बात यह है कि यहां जो स्तंभ बने हैं, वह प्राकृतिक रूप से बनी हुई है।कुटुमसर का इतिहास : कुटुमसर की गुफाएं भारत की सबसे गहरी गुफा मानी जाती है। यह गुफा की जमीन से गहराई 60 से 120 फ़ीट तक की है। यह गुफा 4500 फ़ीट लम्बी है। इस गुफा की खोज प्रोफेसर शंकर तिवारी ने की थी। एक अध्ययन से पता चला है कि करोड़ों वर्ष पूर्व प्रागैतिहासिक काल में बस्तर की कुटुमसर की गुफाओं में मनुष्य रहा करते थे। चूना पत्थर से बनी कुटुमसर की गुफाओं के आंतरिक और बाह्य रचना के अध्ययन के बाद शोधकर्ता कई निष्कर्षों पर पहुंचे हैं।
आकाशवाणी केंद्र ने इन पत्थरों को बनाया वाद्य यंत्र : माना जाता इस गुफा में पानी के साथ जो कैल्शियम गिरता था, वह जमते हुए सुंदर आकृतियों और स्तम्भों का रूप में परिवर्तित हो गया। इस रहस्यमयी गुफा में यहां के पत्थरों को वाद्य यंत्र की तरह उपयोग करते हुए विभिन्न तरह के स्वर निकाले थे।
गुफा में हैं अंधी मछलियां : पानी से घिरी हुई यह अंधेरी कुटुमसर गुफा, जहां अंधी मछलियां रहती हैं । यह गुफाएं बहुत पुरानी बनी है और अंधी मछलियों के लिए मशहूर है। जहां सूरज की रोशनी नहीं पहुंचती जिसके कारण यहां आने वाला व्यक्ति पूरी तरह अंधा महसूस करता है। इसके कारण यहां की मछलियों की आखों पर एक पतली सी झिल्ली चढ़ चुकी है, जिससे वे पूरी तरह अंधी हो गई हैं।
उल्लेखनीय है कि, बस्तर संभाग मुख्यालय से करीब 35 किलोमीटर दूर स्थित कांगेरघाटी राष्ट्रीय उद्यान में कोटमसर, कैलाश व दण्डक गुफा मौजूद है। इसके अलावा तीरथगढ़ जलप्रपात व कांगेरधारा भी मौजूद है। बरसात के मौसम में गुफाओं में पानी भरने तथा जहरीले जीव-जन्तु के खतरे को देखते हुए 15 जून को बंद कर दिया जाता है। इसके बाद साढ़े 4 माह बाद साफ-सफाई कर फिर से पर्यटकों के लिए गुफाओं के द्वार खोल दिये जाते हैं ।