मुंबई – भारतीय रुपया शुक्रवार को तेज गिरावट के साथ रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंचा। उसने पहली बार 93 का स्तर पार किया। इस गिरावट ने बाजार में चिंता बढ़ाई। मजबूत US डॉलर और वैश्विक अनिश्चितता ने दबाव बढ़ाया। इसके चलते निवेशकों ने सुरक्षित विकल्पों की ओर रुख किया।
शुरुआती कारोबार में रुपया 93.15 प्रति डॉलर तक पहुंचा। उसने पिछले दिनों की कमजोरी को आगे बढ़ाया। इसी दौरान वैश्विक तनाव बढ़ा। साथ ही कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आई। इन दोनों कारकों ने रुपये पर अतिरिक्त दबाव डाला।
इसके अलावा, निवेशकों ने जोखिम से दूरी बनाई। उन्होंने उभरते बाजारों से पैसा निकाला। नतीजतन, डॉलर की मांग बढ़ी। जैसे-जैसे डॉलर मजबूत हुआ, रुपया कमजोर पड़ता गया।
दूसरी ओर, तेल की कीमतों ने सीधा असर डाला। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है। इसलिए तेल महंगा होने पर आयात बिल बढ़ता है। इससे चालू खाता घाटा भी बढ़ता है। यही कारण है कि रुपये पर दबाव और गहरा हुआ।
इसी बीच, विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से निकासी जारी रखी। बाजार के जानकारों ने लगातार FII आउटफ्लो दर्ज किया। इस कदम से बाजार में नकदी घटी। साथ ही निवेशकों का भरोसा कमजोर हुआ।
वहीं, US फेडरल रिजर्व ने सतर्क रुख बनाए रखा। उसने ब्याज दरों में कटौती की सीमित गुंजाइश दिखाई। इससे वैश्विक तरलता कड़ी बनी रही। नतीजतन, डॉलर अन्य मुद्राओं के मुकाबले मजबूत बना रहा।
ग्राउंड एंगल: महंगाई की आशंका, आम आदमी और कारोबार पर असर
जमीन पर असर दिखने लगा है। आयातक कंपनियों की लागत बढ़ रही है। खासकर ईंधन और कच्चे माल पर खर्च बढ़ा है। ट्रांसपोर्ट सेक्टर भी दबाव में आया है। ईंधन महंगा होते ही संचालन लागत बढ़ती है।
इसके साथ ही, आम लोगों की चिंता भी बढ़ी है। आने वाले समय में पेट्रोल-डीजल महंगा हो सकता है। इससे रोजमर्रा के खर्च बढ़ सकते हैं। कई जरूरी सामान भी महंगे हो सकते हैं। छोटे कारोबारी कीमतें समायोजित करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन अनिश्चितता बनी हुई है।
बैकग्राउंड: वैश्विक संकेतों से तय होती दिशा
रुपये की चाल अक्सर वैश्विक रुझानों से तय होती है। जब दुनिया में जोखिम बढ़ता है, तो निवेशक डॉलर की ओर जाते हैं। इससे डॉलर मजबूत होता है और उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राएं कमजोर पड़ती हैं।
साथ ही, अमेरिकी नीतियां भी अहम भूमिका निभाती हैं। जब फेड सख्त रुख अपनाता है, तो वैश्विक निवेश अमेरिका की ओर जाता है। इससे भारत जैसे बाजारों से पूंजी निकलती है।
तेल की कीमतें भी एक बड़ा कारक हैं। हर बढ़ोतरी भारत के आयात बिल को बढ़ाती है। इससे रुपये पर दबाव आता है।
अब बाजार की नजर RBI पर टिकी है। अगर उतार-चढ़ाव बढ़ता है, तो केंद्रीय बैंक कदम उठा सकता है। साथ ही, निवेशक तेल की कीमतों और वैश्विक माहौल पर नजर रखेंगे।
फिलहाल, रुपया दबाव में बना हुआ है। आगे की दिशा वैश्विक संकेतों और नीतिगत कदमों पर निर्भर करेगी।