बिहार में सोमवार को राज्यसभा चुनाव ने साफ तस्वीर पेश की। NDA ने पांचों सीटें जीत लीं। उसने रणनीति के साथ मैदान संभाला। दूसरी ओर, विपक्ष अपने ही आंकड़े नहीं बचा सका। चार विधायक वोटिंग में नहीं आए, और समीकरण बिगड़ गया।
सबसे पहले, NDA ने अपनी ताकत दिखाई। उसके सभी 202 विधायक समय से पहले मतदान केंद्र पहुंचे। उन्होंने एकजुट होकर वोट डाला। इस कदम ने शुरुआत से ही बढ़त तय कर दी। वहीं, विपक्ष 41 के आंकड़े पर खड़ा था, लेकिन चार अनुपस्थितियों ने इसे 37 पर ला दिया।
इसके बाद, पांचवीं सीट का मुकाबला अहम बना। पहले वरीयता वोट में कोई भी पक्ष जरूरी आंकड़ा पार नहीं कर सका। ऐसे में चुनाव दूसरे वरीयता वोट पर पहुंचा। यहीं NDA की रणनीति काम आई। बीजेपी नेता शिवेश कुमार ने तीसरे राउंड में 4000 से ज्यादा वोट लेकर जीत दर्ज की। विपक्ष का उम्मीदवार यहीं मुकाबले से बाहर हो गया।
इस दौरान, NDA के वरिष्ठ नेताओं को सुरक्षित वोट मिले। नीतीश कुमार और नितिन नवीन को 44-44 वोट मिले। वहीं राम नाथ ठाकुर और उपेंद्र कुशवाहा को 42-42 वोट मिले। इससे गठबंधन की एकजुटता साफ दिखी।
दूसरी तरफ, विपक्ष ने बाहरी समर्थन जुटाया। उसे AIMIM और BSP का साथ मिला। इसके बावजूद अंदरूनी कमजोरी सामने आ गई। कांग्रेस के तीन विधायक—मनोज बिस्वास, सुरेंद्र प्रसाद और मनोहर प्रसाद सिंह—मतदान में नहीं पहुंचे। साथ ही RJD विधायक फैसल रहमान भी अनुपस्थित रहे। इससे विपक्ष की रणनीति कमजोर पड़ गई।
इसके बाद, बयानबाजी तेज हुई। जेडीयू नेता संजय कुमार झा ने कहा कि NDA ने पहले से योजना बनाई थी। उन्होंने कहा कि दूसरे वरीयता वोट निर्णायक होंगे, और वही हुआ। उन्होंने विपक्ष पर आरोप लगाया कि वह अपने विधायकों को संभाल नहीं सका।
हालांकि, विपक्ष ने पलटवार किया। RJD नेता तेजस्वी यादवने सत्ता पक्ष पर दबाव और धनबल के आरोप लगाए। वहीं कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम ने बीजेपी पर विधायकों को तोड़ने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि अचानक संपर्क टूटना संदेह पैदा करता है।
इसके जवाब में, NDA नेताओं ने आरोप खारिज किए। जेडीयू मंत्री अशोक चौधरी ने कहा कि विपक्ष के भीतर असंतोष है। उन्होंने कहा कि इसी वजह से विधायक नहीं आए। वहीं NDA नेताओं ने इसे विपक्ष की विफलता बताया।
जमीनी स्तर पर यह चुनाव कई संकेत देता है। 243 सदस्यीय विधानसभा में NDA के पास पहले से मजबूत बहुमत है। उसे चार सीटें आसानी से मिलनी थीं। पांचवीं सीट के लिए उसने अलग रास्ता चुना। उसने अतिरिक्त वोट जुटाने के बजाय दूसरे वरीयता पर भरोसा किया। यह रणनीति सफल रही।
पृष्ठभूमि में कांग्रेस की अंदरूनी स्थिति भी चर्चा में रही। पार्टी चार महीने से विधायक दल का नेता तय नहीं कर सकी। इससे असंतोष बढ़ा। राज्यसभा चुनाव ने इस दरार को उजागर कर दिया।
आगे, जेडीयू संगठन पर भी नजर है। पार्टी अध्यक्ष पद के लिए प्रक्रिया शुरू हो गई है। सूत्रों के अनुसार नीतीश कुमार इस पद पर बने रह सकते हैं। राज्यसभा में उनकी एंट्री से उनकी राष्ट्रीय भूमिका भी बढ़ सकती है।
अंत में, NDA ने संख्या और रणनीति दोनों का इस्तेमाल किया। वहीं विपक्ष अपनी ही कमजोरी में उलझा रहा। यह नतीजा बिहार की राजनीति की दिशा तय कर सकता है।