नेपाल में बालेंद्र शाह का उदय: भारत-नेपाल के ‘रोटी-बेटी’ रिश्तों पर क्या असर पड़ेगा?
khabarworld 10/03/2026 0
नेपाल की राजनीति एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है। पिछले साल युवाओं के नेतृत्व में हुए विरोध प्रदर्शनों ने प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की सरकार को सत्ता से बाहर कर दिया। इसके बाद देश में राजनीतिक अनिश्चितता बनी रही। हालांकि, हालिया चुनावों ने इस स्थिति को बदल दिया। अब काठमांडू के मेयर बालेंद्र शाह देश के अगले प्रधानमंत्री बनने की दौड़ में सबसे आगे नजर आ रहे हैं।
दरअसल, बालेंद्र शाह का उदय अचानक नहीं हुआ। इसके संकेत पहले ही दिखने लगे थे। नवंबर 2025 में शाह ने सोशल मीडिया पर एक तीखा पोस्ट लिखा। उन्होंने नेपाल की पारंपरिक राजनीतिक पार्टियों पर खुलकर हमला किया। साथ ही उन्होंने भारत, चीन और अमेरिका जैसे देशों का भी जिक्र किया। हालांकि यह पोस्ट केवल कुछ मिनट तक ही ऑनलाइन रहा, लेकिन तब तक उसके स्क्रीनशॉट तेजी से वायरल हो चुके थे।
इस घटना ने एक बड़ा संदेश दिया। नेपाल की युवा पीढ़ी अब पुराने राजनीतिक ढांचे से असंतुष्ट नजर आती है। कई युवाओं को लगता है कि दशकों से वही राजनीतिक चेहरे देश की दिशा तय करते रहे। इसलिए इस बार मतदाताओं ने बदलाव को प्राथमिकता दी।
इसके बाद सितंबर में हुए बड़े जनआंदोलन ने राजनीति को नई दिशा दी। आंदोलन के दबाव में ओली को पद छोड़ना पड़ा। फिर नेपाल ने 5 मार्च को चुनाव कराए। इस चुनाव में बालेंद्र शाह ने राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के उम्मीदवार के रूप में मैदान में उतरकर बड़ी जीत दर्ज की। अगर वह प्रधानमंत्री बनते हैं तो 35 साल की उम्र में नेपाल के सबसे युवा प्रधानमंत्री होंगे।
इस राजनीतिक बदलाव को कई विशेषज्ञ नेपाल की राजनीति में “भूकंप” की तरह देखते हैं। मतदाताओं ने पुराने राजनीतिक ढांचे को लगभग खारिज कर दिया। कम्युनिस्ट दलों और नेपाली कांग्रेस जैसी पारंपरिक पार्टियों को इस चुनाव में बड़ा झटका लगा।
रणनीतिक मामलों के जानकार ब्रह्मा चेलानी मानते हैं कि यह परिणाम चीन की क्षेत्रीय रणनीति के लिए भी झटका है। बीजिंग लंबे समय से नेपाल के कम्युनिस्ट दलों के साथ करीबी संबंध बनाए हुए था। उसका उद्देश्य काठमांडू में स्थिर और अनुकूल सरकार बनाए रखना था। लेकिन चुनावी नतीजों ने उस रणनीति को कमजोर कर दिया।
वहीं भारत के लिए यह बदलाव एक अवसर भी बन सकता है। पिछले कुछ वर्षों में भारत और नेपाल के रिश्तों में उतार-चढ़ाव आया। 2015 के सीमा विवाद और बाद के वर्षों में सीमा से जुड़े मुद्दों ने दोनों देशों के संबंधों को प्रभावित किया। इसके बाद काठमांडू की कई सरकारें चीन के करीब आती दिखीं।
अब नई पीढ़ी के नेताओं के आने से भारत को रिश्तों को फिर से मजबूत करने का मौका मिल सकता है। हालांकि विशेषज्ञ सावधानी बरतने की सलाह देते हैं।
भारत और नेपाल के संबंध केवल राजनीति तक सीमित नहीं हैं। दोनों देशों के बीच सदियों पुराने सामाजिक और सांस्कृतिक रिश्ते मौजूद हैं। खुली सीमा के कारण हर साल लाखों लोग रोजगार, व्यापार और शिक्षा के लिए एक-दूसरे के देश में आते-जाते हैं।
इन्हीं गहरे रिश्तों को आम तौर पर “रोटी-बेटी का रिश्ता” कहा जाता है। यह शब्द दोनों देशों के लोगों के बीच मौजूद पारिवारिक, सांस्कृतिक और सामाजिक जुड़ाव को दर्शाता है।
वरिष्ठ पत्रकार केशव प्रधान मानते हैं कि भारत और नेपाल के संबंध दुनिया के कई पड़ोसी देशों से कहीं अधिक गहरे हैं। हालांकि वह यह भी कहते हैं कि नेपाल की युवा पीढ़ी की सोच बदल रही है। अब कई युवा शिक्षा और रोजगार के लिए अन्य देशों की ओर भी देख रहे हैं।
इसके बावजूद भौगोलिक और ऐतिहासिक कारणों से भारत नेपाल का सबसे महत्वपूर्ण साझेदार बना रहेगा।
हालांकि बालेंद्र शाह के नेतृत्व में नेपाल की राजनीति कुछ हद तक अप्रत्याशित भी हो सकती है। पहले भारत के नीति विशेषज्ञ काठमांडू की राजनीति को आसानी से समझ लेते थे। लेकिन अब नई पीढ़ी के नेताओं के साथ यह अनुमान लगाना आसान नहीं रहेगा।
इसी कारण विशेषज्ञ भारत को संयम और संवेदनशीलता के साथ आगे बढ़ने की सलाह देते हैं। उनका मानना है कि नई दिल्ली को नेपाल के साथ सम्मानजनक और संतुलित संवाद बनाए रखना चाहिए।
कुल मिलाकर बालेंद्र शाह का उदय नेपाल की राजनीति में पीढ़ीगत बदलाव का संकेत देता है। वहीं भारत और नेपाल के पारंपरिक रिश्ते अब भी मजबूत हैं। लेकिन आने वाले वर्षों में इन संबंधों की दिशा इस बात पर निर्भर करेगी कि नई दिल्ली और काठमांडू नई राजनीतिक परिस्थितियों को किस तरह संभालते हैं।
